भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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काण्ड ] कुष्ठरोगका निदान २९५


इसमें दर्द नहीं होता। यह अत्यन्त पीला, लोहित और पाण्डु रंगकी पिडिकाओंसे भर जाता है। इसके स्वरूपकी कान्ति कृष्ण और मलिन मानी गयी है। यह रोग शोथसे युक्त और भारी होता है। यह स्पर्श करनेमें अधिक ऊष्मासे समन्वित अनुभूत होता है। इसमें पसीने-जैसी चिपचिपाहट होती है। जब यह पककर फूटता है तो इसमें मांस गल-गलकर नये रूपमें निकलने लगता है। शरीरकी स्नायु तथा शिराएँ स्पष्ट रूपसे दिखायी देने लगती हैं। इस प्रकार सभी लक्षणोंसे युक्त हुआ यह विसर्परोग अन्ततोगत्वा शरीरकी त्वचासे सम्पृक्त हो जाता है, जिसके कारण यह बाह्य भागमें दिखायी देने लगता है। इस रोग-स्थानसे शवके समान दुर्गन्ध निकलती है। विद्वानोंने इसको कर्दम विसर्परोगके नामसे अभिहित किया है।

बाह्य आघात आदिके कारण क्षत हुए शरीरसे क्रुद्ध १ वायु पित्तको रक्तसमन्वित करता हुआ कुलथीके दानोंके समान स्फोटजनित विसर्पको जन्म देता है। इसमें शोथ, ज्वर, पीड़ा, दाहाधिक्य, श्याम और रक्तवर्णताका लक्षण भी दिखायी पड़ता है। पृथक्-पृथक् वात, पित्त तथा कफजनित दोषसे उत्पन्न उक्त तीनों प्रकारका विसर्परोग साध्य है। इतना ही नहीं, वात-पित्त आदि द्वन्द्वजनित दोषसे समन्वित विसर्प यदि उपद्रवसे रहित हैं तो वे भी यथापेक्षित चिकित्सासे दूर किये जा सकते हैं, किंतु जो विसर्प समस्त दोषोंसे युक्त हो जाते हैं और जिनका आक्रमण रोगीके मर्म २ स्थलको आहत करनेमें सफल हो जाता है, जिसके दुष्प्रभावसे रोगीके शरीरका स्नायु, शिरा और मांस गल जाता है और जिनसे शवके समान दुर्गन्ध आने लगती है—वे विसर्परोग असाध्य हो जाते हैं, उनकी चिकित्सा सम्भव नहीं है। (अध्याय १६३)


कुष्ठरोगका निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! मिथ्या एवं विरोधी आहार-विहार करनेसे तथा सज्जनोंकी निन्दा एवं अपमान और वध या हत्या करनेसे, दूसरोंकी धन-सम्पत्तिके हरण एवं पाप-कृत्यसे, पूर्वजन्मकृत पापका उदय होनेसे वातादि दोष कुपित होकर शिराओंमें जाकर त्वचा, लसीका, रक्त एवं मांसको दूषित और अङ्गोंकी क्रिया-हानि करके वे दोष बाहर आकर त्वचापर विविध प्रकारके कुष्ठ ३ को उत्पन्न करते हैं।

सामयिक उपेक्षा करनेपर यह रोग आभ्यन्तरिक समस्त कोष्ठकोंके सहित शरीरमें व्याप्त होकर बाहर और भीतर रहनेवाली सभी धातुओंको गलाकर अपना अधिकार कर लेता है। इस रोगमें पसीनेके जलबिन्दुओंसे युक्त प्राणीके शरीरपर कुछ आर्द्रता होती है। इसमें अत्यन्त कष्टदायक बहुत ही छोटे-छोटे कीड़े होते हैं। इन सभी लक्षणोंसे युक्त यह रोग क्रमशः रोगीके रोम, त्वचा, स्नायु तथा धमनियोंपर आक्रमण करता है।

बाह्य भागमें फैला हुआ कुष्ठरोग प्राणीके उस आक्रान्तित शरीरको भस्मसे आच्छादित हुएके समान रूक्ष बना देता है। वात, पित्त, श्लेष्म, वातपित्त, वातश्लेष्म, पित्तश्लेष्म और संनिपात-दोषजन्य प्रभावसे यह रोग सात प्रकारका होता है। इन सभी प्रकारके कुष्ठ-भेदोंमें वात-पित्त तथा कफज दोषके अन्तर्गत प्राप्त होनेवाली विकृति अधिक रहती है।


१-सु०नि०अ० १०; च०चि०अ० २१। २-च०चि० २१; अ०हृ०नि०अ० १४। ३-सु०नि०अ० ५।

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