भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 634 में से

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पृष्ठ 307

काण्ड ] कुष्ठरोगका निदान २१७

तथा कठोर होता है, वह किटिम कुष्ठ माना गया है। सिध्म कुष्ठ अन्तर्भागसे रूक्ष और बाह्यरूपमें स्निग्ध होता है। इसके आभ्यन्तरिक भागको रगड़नेसे बालूके कणके समान रज गिरता है। इस रोगके होनेपर शरीरका स्पर्श करनेसे चिकनाहट का अनुभव होता है। इसमें स्वच्छता होती है। इसकी वर्णाकृति काले पुष्पके समान दिखायी देती है, यह कुष्ठ प्रायः शरीरके ऊपरी भागमें होता है।

अलंशुका (अलसक) कुष्ठमें खुजली और लाल रंगकी पिडिका होती है। विपादिका कुष्ठमें हाथ और पाँव फट जाते हैं, अत्यन्त वेदना और खुजली होती है तथा लाल वर्णकी फुंसियाँ हो जाती हैं। जिस कुष्ठमें दद्रु या दाद दूर्वाके समान बहुत जगहमें फैल जाता हो तथा अलसीके फूलके सदृश कान्ति दिखायी देती हो और ऊँचे-ऊँचे गोल चकत्ते हों, ऐसा खुजलाहटसे परिव्याप्त कुष्ठ दद्रु या दाद कुष्ठ कहलाता है।

अपने मूलभागमें स्थूल, दाह और वेदनासे समन्वित रक्तस्राववाले प्रचुर व्रणोंसे युक्त कुष्ठरोगका नाम शतारुषी है। इस प्रकारके कुष्ठरोगमें दाह, क्लेद और वेदना होती है। यह प्रायः अस्थिके जोड़ोंमें होता है। जिस कुष्ठमें कुष्ठ-स्थानका मण्डल रक्तसे भरा हुआ तथा पाण्डु वर्णका होता है, उसमें दाह और खुजलाहट-भरी पीड़ा भी होती है, खिले हुए रक्तवर्ण और जलसे संसिक्त पुण्डरीक-दल अर्थात् श्वेत कमलकी पंखुड़ियोंके समान शरीरपर उभरा हुआ और व्रणके किनारे पद्मपत्रकी जल-विन्दुओंसे युक्त मांसवाले दिखायी देते हैं, उसे पुण्डरीक कुष्ठ कहते हैं। विस्फोटक कुष्ठ पतले चमड़ेसे ढका होता है तथा सफेद और लाल फुंसियोंसे व्याप्त होता है।

पामा नामक कुष्ठ पककर फूटनेवाली छोटी-छोटी असंख्य फुंसियोंसे भरा होता है। इसमें खुजली, मलस्राव और वेदना होती है। प्रायः इसका वर्ण श्याम और लाल होता है। इसमें रूक्षता होती है। यह रोगीके कूल्हे, चूतड़ और हाथके रोम-छिद्रोंमें होता है। चर्मदल नामक कुष्ठ फोड़ा-फुंसीके रूपमें उभरकर फफोले पड़कर फूटता है, यह किये गये स्पर्शको सहन करनेमें समर्थ नहीं होता। इसमें खुजलाहट होती है, रक्तस्राव होता है, जलन भी होती है और मांस गलकर गिरता है।

काकण नामक कुष्ठमें अत्यन्त दाह और तीव्र वेदना होती है। गुंजाफलके समान यह पहले लाल और काले अनेक रंगका होता है। अपने-अपने कारणोंसे सब कुष्ठोंके लक्षण इसमें पाये जाते हैं।

दोषै-भेदके अनुसार त्रिदोषोंमें जो दोष कुष्ठमें अधिक विहित हो, उसीके लक्षण और कर्मके अनुसार त्रिदोषज कुष्ठका स्वरूप समझना चाहिये। जो कुष्ठ-भेद अपने ही दोषका अनुगमन करता है अर्थात् वह द्वन्द्वज दोष या संनिपातज दोषसे सम्पृक्त नहीं होता तो उसकी चिकित्सा सम्भव है। किंतु जब वह सभी दोषोंसे परिव्याप्त हो जाता है तो उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये, वह असाध्य हो जाता है।

उपर्युक्त जितने भी कुष्ठ हैं, उनमेंसे जो कुष्ठ अस्थि, मज्जा और शुक्राणुओंमें प्रविष्ट हो गया है, वह कुष्ठ भी असाध्य है। जो कुष्ठ मेदगत है और जो स्नायु, अस्थि एवं मांसमें पहुँच गया है, वह अधिक कष्टसाध्य नहीं है। जिस कुष्ठका जन्म कफ और वातके कारण त्वचापर ही होता है, जिसमें विशेष दोष नहीं रहता, वह कष्टसाध्य नहीं होता। सामान्य चिकित्सासे ही उसकी शान्ति हो सकती है।

त्वचाभागपर ऐसे कुष्ठके उभर आनेसे शरीरका वर्ण बदल जाता है, उसमें रूक्षता आ जाती है।


* सू०सू०अ० १२।

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