गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 333, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्सा, ग्रहदोषके उपाय, ऋतुचर्या तथा पथ्यकारक सर्वौषधियाँ ३२३
प्रकारके नेत्र-सम्बन्धित रोगोंका विनाशक है।
त्रिकटु, त्रिफला, सेंधा नमक, मैनसिल, रुचक<sup>१</sup>, शंखनाभि (कचूर), जातीपुष्प (मालती), नीम, रसाञ्जन (रसौत) और भृंगराजको घृत, मधु तथा दुग्धमें पीसकर बनायी गयी वटी समस्त नेत्रविकारोंकी विनाशकारिणी औषधि है।
एरण्डकी जड़को जलाकर कांजीके साथ सिरमें लेप करने अथवा मुचुकुन्द-पुष्पके प्रयोगसे शीघ्र ही सिर-पीड़ा दूर हो जाती है।
शतमूली<sup>२</sup>, एरण्डमूल, चक्रा (कुटकी) तथा व्याघ्री (कण्टकारी)-को एक-एक पल एकत्र करके उनसे सिद्ध क्वाथ, तैलपाकका नस्य वात और श्लेष्मजन्य तिमिर तथा ऊर्ध्वरोगका विनाश करता है अथवा नमक, गुड़ और सोंठ या पिप्पली एवं सेंधा नमकका योग भुजस्तम्भ आदि सभी शरीरके ऊर्ध्वभागवाले रोगोंमें लाभकारी होता है। सूर्यावर्त-रोगमें नस्यकर्मका उपचार प्रशस्त माना गया है। ऐसेमें घृत एवं सेंधा नमकसे युक्त दशमूलके क्वाथका नस्य लेना चाहिये। यह अङ्गभेद, सूर्यावर्त तथा शिरोव्याधिके दुःखोंको दूर करता है।
वातरक्त-दोषसे पीड़ित स्त्रीको दही एवं मधुके साथ काला नमक, जीरा, महुआ और नीलकमल पीसकर पान करना चाहिये। पित्त-विकार होनेपर अडूसा अथवा गुडूचीका रस लाभकारी है। मधुके साथ जलमें पकाये गये आँवलेके बीजोंका कल्क, अडूसा तथा श्वेत दूर्वाका रस अथवा आँवलेके साथ मधु और कपासकी जड़का रस चावलके धोवनमें पीनेसे पाण्डु एवं प्रदर-रोग शान्त हो जाता है।
तण्डुलीयक मूल अर्थात् चौराई तथा रसौतको पीसकर मधु एवं चावलके धोवनमें पीनेसे सभी प्रकारका रक्तप्रदर-रोग विनष्ट हो जाता है। चावलके जलके साथ पान किया गया कुशका मूल भी रक्तप्रदर-रोगका विनाशक है। (अध्याय १७१)
स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्सा, ग्रहदोषके उपाय, ऋतुचर्या तथा पथ्यकारक सर्वौषधियाँ
धन्वन्तरिजीने कहा— हे सुश्रुत! अब मैं स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्साका वर्णन करूँगा। उसे आप सुनें। स्त्रियोंके योनिभागमें होनेवाले रोगोंको दूर करनेके लिये बहुत-से कर्म हैं, किंतु जो कर्म वातदोष-नाशक हैं, उन्हींको प्रशस्त माना जाता है।
वच, उपकुञ्चिका (काला जीरा), जातीफल (जायफल), कृष्णा (काली तुलसी), वासक (अडूसा), सैन्धव (सेंधा नमक), अजमोदा (अजवाइन), यवक्षार, चित्रक तथा शर्कराको पीसकर सभीको मिश्रित करके घीमें भूनकर जल या दूधके साथ सेवन किया जाय तो स्त्रियोंकी योनिके पार्श्वभागमें होनेवाला शूल, हृदयरोग, गुल्म और अर्श-विकार दूर हो जाता है। बेरकी पत्तियोंको पीसकर योनिभागमें लेप करनेसे उसकी वेदना शान्त हो जाती है। लोध्र और तुम्बीफलका प्रलेप योनिको दृढ़ एवं संकुचित बनाता है।
पीपल, वट, पाकड़, गूलर और आम—इन पाँचोंके पल्लव और मधुयष्टि तथा मालतीपुष्पका अग्नि या सूर्यकी गर्मीमें सिद्ध घृतपाक रक्तप्रदर एवं योनि-दुर्गन्धका विनाशक है। कांजीमें जपापुष्प (अड़हुलके फूल), ज्योतिष्मती-दल, मालकँगनीकी पत्ती (दूर्वा) और चित्रकको पीसकर शर्कराके साथ पान करनेसे भी योनिरोग दूर हो जाता है।
आँवला, रसौत तथा हरीतकीका चूर्ण जलके
१-रुचक (बिजौरा नीबू)। २-शतमूली (शतावरी)