भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

वायुका भ्रमण हो तो प्रश्नकर्ताका प्रश्न शुभकर तथा श्रेष्ठ माना गया है। वायुके महेन्द्र तथा वरुण (जल-तत्त्व)-में प्रवाहित होनेपर कोई भी दोष नहीं होता। दाहिनेसे प्रवाहित होनेपर अनावृष्टिका योग तथा बायेंसे प्रवाहित होनेपर वृष्टिका योग होता है। (अध्याय २००)

उत्तम तथा अधम अश्वोंके लक्षण, अश्वोंके आगन्तुज और त्रिदोषज रोगोंकी चिकित्सा तथा अश्वशान्ति, गजायुर्वेद, गजचिकित्सा और गजशान्ति

धन्वन्तरिने कहा—अब मैं अश्वायुर्वेद और अश्वोंके शुभ-अशुभ लक्षणोंका वर्णन करता हूँ।

जो अश्व कौएके समान नुकीले मुँहवाला, काली जीभवाला, वृक्षके समान फैले मुँहवाला, गरम तालुप्रदेशवाला, दोसे अधिक दन्तपङ्क्तियोंसे युक्त, दाँतरहित, सींगवाला, दाँतोंके मध्य रिक्त स्थानवाला, एक अण्डकोशसे युक्त, अण्डकोशसे रहित, कंचुकी (वक्षःस्थलपर कंचुकके लक्षणसे समन्वित), दो खुरोंसे सम्पन्न, स्तनयुक्त, बिलौटेके समान पैरोंवाला, व्याघ्रके सदृश रूप एवं वर्णसे समन्वित, कुष्ठ तथा विद्रधि रोगके रोगी पुरुषके समान, जुड़वाँ उत्पन्न होनेवाला, बौना, बिलौटे और बंदरसदृश नेत्रोंवाला हो, वह दोषयुक्त होनेसे त्याज्य है।

उत्तम जातिका घोड़ा तो वह होता है, जो तुरुष्क प्रदेश (तुर्किस्तान, सिन्धु या अरब देश)-में जन्म लेता है। इसकी ऊँचाई सात हाथ होती है। मध्यम कोटिका घोड़ा पाँच हाथ और तृतीय कोटिका घोड़ा तीन हाथ ऊँचा माना गया है। स्वस्थ घोड़े छोटे-छोटे कानवाले, चितकबरे, प्रभावशाली, उत्साहसम्पन्न और दीर्घजीवी होते हैं।

रेवन्त सूर्यदेवके पुत्र हैं। इनकी पूजा, होम तथा 'ब्राह्मण-भोजन' आदिके द्वारा अश्वोंकी रक्षा करनी चाहिये। चीड़-वृक्षका काष्ठ, नीमकी पत्ती, गुग्गुल, सरसों, घृत, तिल, वचा (वच) और हींगको पोटली आदिमें रखकर घोड़ेके गलेमें बाँधनेसे घोड़ेका सदैव कल्याण होता है।

घोड़ेके शरीरमें उत्पन्न होनेवाला मुख्य दोष व्रण (घाव होना) है। यह दो प्रकारका होता है—एक है आगन्तुज व्रणदोष और दूसरा है वात-पित्त आदि त्रिदोषोंसे उत्पन्न व्रणदोष। वातविकारके कारण उत्पन्न व्रणदोष चिरपाक (देरसे पकनेवाला) होता है और श्लेष्मविकारके कारण उत्पन्न व्रणदोष क्षिप्रपाक (शीघ्र पकनेवाला) होता है। पित्तज दोषके कारण उत्पन्न व्रणदोष घोड़ेके कण्ठ-भागमें दाह और रक्तविकारके कारण उत्पन्न व्रणमें मन्द-मन्द वेदना होती है। आगन्तुज अर्थात् बाहरसे चोट, गिरने या आघात आदिसे उत्पन्न व्रणदोषका शोधन शल्य-चिकित्साके द्वारा करना चाहिये। व्रणकी यह चिकित्सा करके उसमें एरण्डमूल, हल्दी, दारुहल्दी, चित्रक, सोंठ और लहसुन, मट्ठे अथवा काँजीमें पीसकर भर देना चाहिये। तिल, सत्तू, दही, सेंधानमक और नीमकी पत्ती एक साथ पीसकर उस व्रणपर रखनेसे भी घोड़ेको लाभ होता है।

परवल, नीमकी पत्ती, वचा (वच), चित्रक, पिप्पली और अदरकका चूर्ण बनाकर घोड़ेको पिलाना चाहिये। इसके सेवनसे घोड़ेका कृमिदोष, श्लेष्मविकार तथा वायुप्रकोप नष्ट हो जाता है। नीमकी पत्ती, परवल, त्रिफला और खैरका काढ़ा