भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

हवन, पूजन, ब्राह्मण-भोजन आदि कराना चाहिये। हरीतकी-कल्पके सेवनसे भी उपसर्गकी शान्ति होती है। गोमूत्र, सरसोंके तैल और सेंधानमकसे युक्त हरीतकीकी मात्रा प्रारम्भमें पाँच मानी गयी है। तत्पश्चात् प्रतिदिन उसकी पाँच-पाँच मात्रा बढ़ाते हुए सौतक की जा सकती है। घोड़ेके लिये एक सौ हरीतकीकी मात्रा उत्तम है। अस्सी तथा साठ मात्राओंका भी परिमाण है जो मध्यम और अधम मात्राएँ मानी गयी हैं।

धन्वन्तरिजीने पुनः कहा—हे सुश्रुत! अब मैं (अश्वायुर्वेदकी भाँति) गजायुर्वेदका वर्णन करने जा रहा हूँ, आप उसे सुनें। अश्वचिकित्सामें बताये गये औषधिक कल्प हाथियोंके लिये भी हितकारी हैं। हाथीके निमित्त उक्त मात्रा चौगुनी होती है। पूर्ववर्णित औषधियोंके द्वारा भी हाथियोंमें पाये जानेवाले रोगोंको दूर किया जा सकता है। हाथियोंकी उपसर्गजनित व्याधियों (दैवीप्रकोप या महामारी आदि)-के उपशमनके लिये गजशान्तिकर्म करना चाहिये। देवताओं और ब्राह्मणोंकी रत्न आदिके द्वारा पूजा करके उन्हें कपिला गौका दान दे। रक्षा-मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित वचा (वच) और सरसोंको मालामें पिरोकर हाथीके दोनों दाँतोंमें बाँधना चाहिये। सूर्य आदि नवग्रहोंके तथा शिव, दुर्गा, लक्ष्मी और विष्णुके पूजन आदिसे हाथीकी रक्षा होती है। देवादिकी पूजा करनेके पश्चात् प्राणियोंके लिये अन्नादिकी बलि देकर हाथीको चार घड़ोंके जलसे स्नान कराना चाहिये। तदनन्तर मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित भोजन हाथीको देना चाहिये। हाथीके पूरे शरीरपर भस्म लगाना चाहिये। त्रिफला, पञ्चकोल (पीपर, पीपरामूल, चव्य, चित्रकमूल, सोंठ), दशमूल, विडङ्ग, शतावरी, गुडूची, नीम, अड़ूसा और पलाशके चूर्ण अथवा क्वाथ हाथीके रोगोंको विनष्ट करनेमें समर्थ हैं। (अध्याय २०१)


स्त्रियोंके विविध रोगोंकी चिकित्सा, बालकोंकी रक्षाके उपाय तथा बलवर्धक औषधियाँ

श्रीहरिने कहा—हे शिव! पुनर्नवा अथवा अपामार्ग नामक औषधिकी जड़का गुण अद्वितीय है। इसका यथाविधि प्रयोग करनेसे प्रसव-वेदनाका कष्ट दूर हो जाता है। भुइँकुम्हड़ाकी जड़ अथवा साठी चावलको पीसकर एक सप्ताहपर्यन्त दूधके साथ सेवन करनेसे स्त्रियोंके दूधकी वृद्धि होती है। हे रुद्र! इन्द्रवारुणी (इन्द्रायण)-की जड़का लेप करनेसे स्त्रियोंके स्तनोंकी पीड़ा विनष्ट हो जाती है। नीली, परवलकी जड़ तथा तिलको जलमें पीसकर घीके साथ तैयार किया गया लेप ज्वालागर्भ नामक रोगका नाश करता है। पाढ़ाकी जड़को चावलके जलके साथ पीनेसे पाप-रोग विनष्ट हो जाता है। ऐसे रोगका विनाश कुष्ठ नामक औषधिके पीनेसे भी सम्भव है। हे शिव! बासी जलमें मधु मिलाकर पीनेसे वह पाप-रोगको दूर कर देता है। गोघृत और लाक्षारसको समभागमें लेकर दूधके साथ उसे पीनेसे प्रदररोग दूर हो जाता है। हे हर! द्विज्यष्टी (ब्रह्मदण्डी), त्रिकटु (सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली)-का चूर्ण तिलके काढ़ेमें मिलाकर पीनेसे स्त्रियोंका रक्तगुल्म रोग दूर हो जाता है। हे महेश! लाल कमलका कन्द, तिल तथा शर्कराका औषधिक योग, स्त्रियोंमें गर्भधारणकी क्षमता उत्पन्न कर देता है। शर्कराके साथ इन औषधियोंको पीनेसे स्त्रियोंका गर्भपात रुक जाता है तथा शीतल जलके साथ सेवन करनेसे रक्तस्राव भी बंद हो जाता है। हे रुद्र! शरपोङ्खाकी जड़का क्वाथ और काँजी, हींग तथा

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