भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ]औषधियोंके पर्यायवाची नाम३६३

आँवलाको धात्री और आमलकी तथा अक्ष एवं विभीतक बहेड़ाको कहा जाता है। पथ्या, अभया, पूतना और हरीतकी शब्द हर्रेंके पर्यायवाची हैं। इन तीनों फलोंको एकमें मिलाकर त्रिफला कहा जाता है। करंज या कंजा उदकीर्य तथा दीर्घवृत्तके नामसे भी प्रसिद्ध हैं। यष्टी, यष्ट्याह्वय, मधुक और मधुयष्टी—ये जेठी मधुके वाचक हैं। धातकी, ताम्रपर्णी, समङ्गा तथा कुंजरा धातीफूलके नाम माने गये हैं। सित, मलयज, शीत और गोशीर्षको श्वेतचन्दन कहा जाता है। जो चन्दन रक्तके सदृश लाल होता है उसका नाम रक्तचन्दन है। काकोली नामकी औषधिको वीरा, वयस्या और अर्कपुष्पिकाके नामसे भी कहा जाता है। शृंगी नामक औषधि कर्कटशृंगी तथा महाघोषाके नामसे प्रसिद्ध है। वंशलोचनको तुगाक्षीरी, शुभा और वांशीके नामसे भी जाना जाता है। द्राक्षाका नाम मृद्वीका तथा गोस्तनिका है।

उशीर अर्थात् खस नामक औषधिका नाम मृणाल और लामज्जक है। सारको गोपवल्ली, गोपी और भद्रा कहा जाता है। दन्ती नामक औषधिका नाम कटङ्कटेरी भी है। हल्दीको दारु, निशा, हरिद्रा, रजनी, पीतिका और रात्रि कहा गया है। वृक्षादनी, छिन्नरुहा, नीलवल्ली तथा अमृतरसा नामवाली औषधि ही गुडूची है। वसुकोट, वाशिर और काम्पिल्ल नामक औषधि एक ही हैं। पाषाणभेदक, अरिष्ट, अश्मभित् तथा कुट्टभेदक—ये सभी नाम पत्थरचट्टा या पत्थरचूनाके वाचक हैं। घण्टाकको शुष्कक और सूचकको वचा (वच) नामसे अभिहित किया गया है। पीतशालको सुरस तथा बीजक नामसे कहा जाता है। वज्रवृक्षको महावृक्ष, स्नुहीको स्नुक् (थूहड़) और सुधाको गुडा माना गया है। तुलसीको सुरसा तथा उपस्था कहा जाता है। लोग इसीको कुठेरक, अर्जुनक, पर्णी और सौगन्धिपर्णी भी कहते हैं। नील नामक औषधि सिन्धुवार है और निर्गुण्डीको सुगन्धिका कहा जाता है। सुगन्धिपर्णी नामकी औषधि वासन्ती और कुलजा नामसे जानी जाती है। कालीयक नामक औषधिके पर्यायवाची शब्द हैं—पीतकाष्ठ तथा कतक। गायत्री नामकी औषधिका नाम खादिर है। कन्दर अर्थात् कत्था उसीका भेद माना गया है। नीलकमलके वाचक इन्दीवर, कुवलय, पद्म तथा नीलोत्पल माने गये हैं। सौगन्धिक, शतदल और अब्ज कमलको कहा जाता है। अजवर्ण, ऊर्ज, वाजिकर्ण तथा अश्वकर्ण एक ही औषधिके नाम हैं। श्लेष्मान्तक, शेलु और बहुवार एक ही अर्थके वाचक हैं।

सुनन्दक, ककुदभद्र, छत्राकी तथा छत्र रास्ना नामकी औषधिके वाचक हैं। कबरी, कुम्भक, धृष्ट, क्षुद्धिा और धनकृत् एक ही औषधिके नाम हैं। कृष्णार्जक तथा कराल नामक औषधि कालमान या काममान नामसे प्रसिद्ध हैं। वरियारा नामक औषधिको प्राची, बला और नदीक्रान्ता कहा जाता है। काकजंघा नामकी औषधिका पर्यायवाची शब्द वायसी है। मूषिकपर्णी नामक औषधि भ्रमन्ती और आखुपर्णीके नामसे जानी जाती है। विषमुष्टि, द्रावण और केशमुष्टि—ये तीनों एक ही औषधिके वाचक हैं। किलिही या किणिहीको कटुकी तथा अन्तकको अम्लवेतस कहा जाता है। अश्वत्था और बहुपत्रा एक ही औषधि है, इसीको लोग आमलकी भी कहते हैं। अरूषक्रका नाम पत्रशूक है। क्षीरीको राजादन नामसे स्वीकार किया गया है। महापत्रका नाम दाडिम है, इसीको करक भी कहा जाता है। मसूरी, विदली, शष्पा तथा कालिन्दी नाम एक ही अर्थके वाचक हैं। कटेरी वृक्षको कण्टका, महाश्यामा और वृक्षपादा कहा जाता है। विद्या, कुन्ती, त्रिभंगी, त्रिपुटी और