भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

काण्ड ] छन्द-विधान [ ३६९


(नौका)—ये अजन्त स्त्रीलिङ्गमें सिद्ध रूप हैं।

वाक् (वाणी), स्रक् (माला), दिक् (दिशा), मुद् (मुदा-प्रसन्नता), क्रुध् (क्रोध), युवति, ककुभ्, द्यौ (आकाश), दिव् (स्वर्ग), प्रावृट् (वर्षा), सुमना और उष्णिक्—ये हलन्त स्त्रीलिङ्गके सिद्ध रूप हैं।

अब मैं आपको गुण, द्रव्य और क्रियाके योगसे बननेवाले स्त्रीलिङ्गके शब्दोंको भी बता रहा हूँ।

शुक्ल (श्वेत), कीलालक (अमृतके समान पेय पदार्थ), शुचि (पवित्रता), ग्रामणी (गाँवका अधिकारी), सुधी (विद्वान्), पटु (चतुर), कमलभू (कमलसे उत्पन्न ब्रह्मा या पराग), कर्तृ (कर्ता), सुमत (सुन्दर विचारोंवाला पुरुष), सूनु (पुत्र), सत्या, अभक्ष (न खाने योग्य), दीर्घपा, सर्वविश्वा, उभय (दो), उभौ, एक, अन्या (दूसरी) और अन्यतरा (दूसरेमें प्रमुख)—ये सब गुणप्रधान शब्द हैं, जो स्त्रीलिङ्गमें बनते हैं।

इसके बाद डतर (उच्चतर), डतम (उच्चतम), नेम, तु (तो), सम (समान), अथ (तदनन्तर), सिम (प्रत्येक), इतर (अतिरिक्त), पूर्व (प्राचीन), अधः (नीचे), च (और), दक्षिण (दक्षिण दिशा), उत्तर (उत्तर दिशा), अवर (अधम), पर (दूसरे), अन्तर, एतद् (यह), यद्यत् (जो-जो), किं (क्या), अदस् (यह), इदम् (यह), युष्मत् (तुम), अस्मत् (मैं-हम), तत् (वह), प्रथम (पहला), चरम (अन्तिम), अल्पतया (संक्षेप), अर्ध (आधा), तथा (और), कतिपय (कुछ), द्वौ (दो), चेति (और ऐसा), एवं (इस प्रकार)—ये सभी शब्द सर्वनाम हैं। इनको सर्वादिगणमें परिगृहीत किया गया है।

शृणोति (सुनता है), जुहोति (हवन करता है), जहाति (परित्याग करता है), दधाति (धारण करता है), दीप्यति (तेजस्वी बन रहा है), स्तयति (स्तुति करता है), पुत्रीयति (पुत्रके समान व्यवहार करता है), धनीयति (धनवान् बन रहा है), त्र्युट्यति, म्रियते (मर रहा है), चिचीर्षति (संग्रहकी इच्छा कर रहा है) तथा निनीषति (ले जानेकी इच्छा कर रहा है)—ये कतिपय तिङन्तके सिद्ध रूप शब्द हैं।

‘सर्व’ शब्दके प्रथमा विभक्तिके बहुवचनमें ‘सर्वे’, चतुर्थी विभक्तिके एकवचनमें ‘सर्वस्मै’, पञ्चमी विभक्तिके एकवचनमें ‘सर्वस्मात्’, षष्ठी विभक्तिके बहुवचनमें ‘सर्वेषाम्’ रूप बनता है। इसी प्रकार विश्व आदि शब्दोंके रूपोंको भी आप जानें। पहले कहे गये ‘पूर्व’ शब्दके प्रथमा विभक्तिके बहुवचनमें ‘पूर्वे, पूर्वाः’ पञ्चमी विभक्तिके एकवचनमें ‘पूर्वस्मात्’ और सप्तमी विभक्तिके एकवचनमें ‘पूर्वस्मिन्’ रूप बनता है।

सूतजीने कहा— हे ऋषियो! सुबन्त और तिङन्त पदोंके सिद्धरूपका वर्णन नाममात्र ही किया गया है। कुमारसे इस व्याकरणको सुनकर कात्यायनने इसको विस्तारपूर्वक कहा था।

(अध्याय २०६)


छन्द-विधान

सूतजीने कहा— अब मैं वासुदेव, गुरु, गणपति, शम्भु और सरस्वतीको नमस्कार करके अल्प बुद्धिवालोंके लिये विशिष्ट बुद्धिकी प्राप्ति-हेतु मात्रा और वर्णके भेदके अनुसार छन्द-विधानको कहता हूँ।

सभी गणोंमें आदि, मध्य और अन्त होता है। इसके अतिरिक्त इनमें गुरु तथा लघु होते हैं। (इन्हीं गुरु तथा लघु वर्णोंसे आठ गणोंकी रचना हुई है,