भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] | सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण | ३८५

और त्रिपदा सावित्री मन्त्रका निरन्तर यथासमय नियतरूपसे जप करनेसे संसारमें किसी भी प्रकारका भय नहीं रहता है। जो उपासक प्रातःकाल उठकर नित्य गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह कमलपत्रकी भाँति पापसे संलिप्त नहीं होता। (देवी गायत्रीका स्वरूप इस प्रकार है—)

श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा।
अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा॥ (२१३। ७०)

अर्थात् गायत्रीदेवी श्वेतवर्णवाली हैं, कौशेय (रेशमी)-वस्त्र तथा अक्ष (माला) एवं सूत्र (यज्ञसूत्र—यज्ञोपवीत)-से विभूषित होकर सुन्दर पद्मासनपर विराजमान रहती हैं। इसी रूपमें विधिवत् ध्यान करके 'तेजोसि०'<sup></sup> इस यजुर्वेदके मन्त्रसे आवाहनकर गायत्रीदेवीकी उपासना करनी चाहिये। प्राचीनकालमें देववर्ग तथा मन्त्रोंका साक्षात्कार करनेकी इच्छा रखनेवाले ऋषिगण यजुर्वेदके इसी मन्त्रका प्रयोग करते थे। अतः सूर्यमण्डलके मध्य विराजमान तथा ब्रह्मलोकमें भी निवास करनेवाली देवीका आवाहन करके गायत्री-मन्त्रका जप करना चाहिये। तत्पश्चात् नमस्कार करके उनका (गायत्रीदेवीका) विसर्जन करना चाहिये। पूर्वाह्नकालमें देवताओंका पूजन करना चाहिये। भगवान् विष्णुसे बढ़कर अन्य कोई देव नहीं है। अतएव साधकको सदैव उनकी पूजा करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन देवोंके प्रति पृथक्-भाव (भेदबुद्धि) न रखे।

इस संसारमें आठ मङ्गल हैं—ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य (सोना), घृत, सूर्य, जल और राजा। सदैव इनका दर्शन एवं पूजन करना चाहिये और यथासम्भव इन्हें अपने दाहिने करके ही चलना चाहिये। ब्राह्मण पहले वेदका अध्ययन करे, उसके बाद चिन्तन, अभ्यास तथा जप करके उसका दान शिष्योंको दे, अर्थात् अपने शिष्योंको वेदाध्ययन कराये। वेदाभ्यासका यही पाँच प्रकार है।

वेदार्थ, यज्ञकर्मप्रतिपादक शास्त्र और धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंका पारिश्रमिक देकर जो लेखनकार्य कराता है और उसे योग्य अधिकारीको प्रदान करता है, वह वैदिक (वेदमें उक्त) लोकको प्राप्त करता है। जो इतिहास-पुराणके ग्रन्थोंको लिखकर दान देता है, वह ब्रह्म (वेद)-दानसे होनेवाले पुण्यका दुगुना पुण्य प्राप्त करता है।

दिनके तीसरे भागमें अपने पोष्य वर्गके प्रयोजनको पूर्ण करना चाहिये। माता, पिता, गुरु, भ्राता, प्रजा, दीन, दुःखी, आश्रितजन, अभ्यागत<sup></sup>, अतिथि<sup></sup> और अग्नि—ये पोष्य वर्ग कहे गये हैं। पोष्य वर्गका भरण-पोषण करना स्वर्गका प्रशस्त साधन है। अतः मनुष्यको पोष्य वर्गका पालन-पोषण प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। इस संसारमें उसी व्यक्तिका जीवन श्रेष्ठ है, जो बहुतोंके जीवनका साधक बनता है। अर्थात् बहुतोंका पालन-पोषण करता है। जो मात्र अपने भरण-पोषणमें लगे रहते हैं, वे जीवित रहते हुए भी मरे हुएके समान हैं; क्योंकि अपना पेटपालन तो कुत्ता भी करता है।<sup></sup>


१-तेजोऽसि तेजो मयि धेहि वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि बलमसि बलं मयि धेह्योजोऽस्योजो मयि धेहि मन्युरसि मन्युं मयि धेहि सहोऽसि सहो मयि धेहि॥ (शु०यजु० १९।९)
२-जो अकस्मात् अपने घर आ जाय वह अभ्यागत है।
३-अतिथि उस सन्तको कहते हैं जो तिथि, पर्व, उत्सव आदिका विवेक नहीं करता है और सदा चलता ही रहता है। यहाँ यमका वचन द्रष्टव्य है—तिथि पर्वोत्सवाः सर्वे त्यक्ता येन महात्मना। सोऽतिथिः सर्वभूतानां शेषानभ्यागतान् विदुः॥
४-माता पिता गुरुर्भ्राता प्रजा दीनाः समाश्रिताः॥
अभ्यागतोऽतिथिश्चाग्निः पोष्यवर्गा उदाहृताः। भरणं पोष्यवर्गस्य प्रशस्तं स्वर्गसाधनम्॥
भरणं पोष्यवर्गस्य तस्माद्यत्नेन कारयेत्। स जीवति वरश्चैको बहुभिर्योपजीव्यति॥
जीवन्तो मृतकास्त्वन्ये पुरुषाः स्वोदरम्भराः। स्वकीयोदरपूर्तिश्च कुक्कुरस्यापि विद्यते॥ (२१३। ७९–८२)