भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 397

काण्ड ] सदाचार एवं शौचाचारका निरूपण ३८७

साधन हैं। ब्राह्मणको सत्पात्र व्यक्तिसे दानरूपमें प्राप्त धनसे अपना निर्वाह करना चाहिये। क्षत्रिय वर्ण अपने शस्त्रास्त्रोंसे धनार्जन करे। वैश्य वर्ण न्यायोचित ढंगसे धनसंग्रह कर अपना कार्य पूर्ण करे और शूद्र सेवा-भावसे धन अर्जितकर अपने सभी कार्योंको सम्पन्न करे। प्रचुर जलराशिसे परिपूर्ण नदी, शाक, मृत्तिका, समिधा, कुश, पलाश, केला आदिके पत्र, अग्निदेवकी आराधनाके उपकरण और ब्रह्मघोष (स्वाध्याय)—ये ब्राह्मणोंके श्रेष्ठतम धन हैं। यदि अयाचित (स्वतःप्राप्त) धनको ब्राह्मण स्वीकार करे तो दोष नहीं है। देवताओोंने ऐसे धनको अमृतके समान कहा है। अतः बिना याचना किये ही आये धनका परित्याग ब्राह्मणको नहीं करना चाहिये।

गुरुके धनका उद्धार करनेकी इच्छासे देवता और अतिथिकी पूजा करते हुए सभीसे प्रतिग्रह लेना चाहिये, पर उसका उपयोग अपनी तुष्टिके लिये नहीं करना चाहिये। साधुसे अथवा असाधुसे भी केवल उसके कल्याणके लिये प्रतिग्रह लेना चाहिये। यदि प्रतिग्रहीता ब्राह्मण (आचारहीन) कर्मनिष्ठ है तो अल्प दोष होगा। यदि निर्गुण है तो दोषमें डूब जायगा। इस प्रकार तस्करवृत्ति (अपने पुण्यको क्षीण करनेवाली वृत्ति)—से अपना भरण करनेके बाद उत्तम द्विजको अपनी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करना चाहिये। दिनके चौथे भागमें मिट्टी, तिल, पुष्प तथा कुशादि सामग्री लाकर प्रकृतिप्रदत्त जलमें स्नान करना चाहिये।

नित्य, नैमित्तिक, काम्य, क्रियाङ्ग, मलापकर्षण, मार्जन, आचमन और अवगाहन—ये आठ प्रकारके स्नान बताये गये हैं। बिना स्नान किया पुरुष जप, अग्नि और हवन आदि करनेका अधिकारी नहीं है। प्रातःस्नान पूजा-पाठ आदि धार्मिक कृत्यके लिये करना चाहिये। इसीको नित्य-स्नान कहा गया है। चाण्डाल, शव, विष्ठा तथा रजस्वला आदिका स्पर्श करनेके पश्चात् जो स्नान किया जाता है, वह नैमित्तिक-स्नान कहलाता है। ज्योतिषशास्त्रके अनुसार पुष्य आदि नक्षत्रोंमें जो स्नानादिक कृत्य किया जाता है, उसे काम्य-स्नान कहते हैं। निष्काम व्यक्तिको इस प्रकारका स्नान नहीं करना चाहिये। जप-होमादिक कृत्योंको सम्पन्न करनेकी इच्छासे प्रेरित होकर अथवा अन्य अनेक पवित्र कृत्य, देवता तथा अतिथि आदिका पूजन करनेकी इच्छासे जो स्नान किया जाता है, उसको क्रियाङ्ग-स्नानके नामसे अभिहित किया गया है। शारीरिक मलको दूर करनेके लिये सरोवर, देवकुण्ड, तीर्थ और नदियोंमें जो स्नान किया जाता है, वह मलापकर्षण-स्नान है। सामान्य जलसे स्नान करनेपर केवल शरीरकी शुद्धि होती है। तीर्थमें स्नान करनेपर विशिष्ट फलकी प्राप्ति होती है। मज्जन (स्नान)—के लिये विहित मन्त्रोंसे मार्जन करनेसे मनुष्यका पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाता है। नित्य, नैमित्तिक, क्रियाङ्ग तथा मलापकर्षण नामक जो स्नान बताये गये हैं, उन स्नानोंको तीर्थका अभाव होनेपर उष्ण जल अथवा अन्य किसी प्रकारसे प्राप्त कृत्रिम जलसे सम्पन्न कर लेना चाहिये।

भूमिसे निकला हुआ जल पवित्र होता है। इस जलकी अपेक्षा पर्वतसे निकलनेवाले झरनेका जल पवित्र होता है। इससे भी बढ़कर पवित्र जल सरोवरका है और उसकी अपेक्षा नदीका जल पवित्र है। नदीके जलकी अपेक्षा भी तीर्थका जल पवित्र है। इन सभी जलोंकी अपेक्षा गङ्गाका जल परम पवित्र है। गङ्गाका श्रेष्ठतम जल तो जीवनपर्यन्त किये गये प्राणीके सभी पापोंका विनाश अतिशीघ्र ही कर देता है। गया तथा कुरुक्षेत्र नामक तीर्थोंके जलसे भी बढ़कर पवित्र एवं पुण्यदायक जल गङ्गाजीका है—