गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] बलिवैश्वदेवनिरूपण ३१३
ॐ यमाय नमः। ॐ धर्मराजाय नमः। ॐ मृत्यवे नमः। ॐ अन्तकाय नमः। ॐ वैवस्वताय नमः। ॐ कालाय नमः। ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः। ॐ औदुम्बराय नमः। ॐ दध्नाय नमः। ॐ नीलाय नमः। ॐ परमेष्ठिने नमः। ॐ वृकोदराय नमः। ॐ चित्राय नमः। ॐ चित्रगुप्ताय नमः। ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगत्तृप्यतु। ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः। ॐ पितामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातृभ्यः स्वधा नमः। ॐ पितामहीभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहीभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। तृप्यतामिति।
अधोलिखित मन्त्रोंका पारायण पितरोंका ध्यान करते हुए करे—
'ॐ उदीरतामवर०', 'ॐ अग्निरसो नः०', 'ॐ आयन्तु नः०', 'ॐ ऊर्जां०', 'ॐ पितृभ्य०', 'ॐ ये चेह०' तत्पश्चात् 'ॐ मधुवाता०' इसके बाद 'ॐ नमो वः पितरो०' इत्यादि मन्त्रसे ध्यान करते हुए अधोलिखित मन्त्रसे जल दे—
ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः नमः। ॐ पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। ॐ मातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ प्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। ॐ वृद्धप्रमातामहेभ्यः स्वधा नमः। आदि·····।
ये चास्माकं कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।
ते तृप्यन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥
इस मन्त्रका पाठकर वस्त्रनिष्पीडित जलसे अपने कुलमें उत्पन्न पुत्र-हीनजनोंके लिये तर्पण करे।
(अध्याय २१५)
बलिवैश्वदेवनिरूपण
ब्रह्माजीने कहा— अब मैं वैश्वदेव-बलिविधिक विधान बतलाता हूँ। यह होमका एक प्रारम्भिक उत्तम स्वरूप है। पहले अग्निको जलाकर अग्निका पर्युक्षण करे, तदनन्तर 'ॐ कव्यादमग्निं०' इत्यादि मन्त्रसे अग्निके लिये कुछ हव्यांशका परित्याग करे। इसके बाद 'ॐ पावक वैश्वानर०' मन्त्रको पढ़कर अग्निका आवाहन करे और ॐ प्रजापतये स्वाहा। ॐ सोमाय स्वाहा। ॐ बृहस्पतये स्वाहा। ॐ अग्निषोमाभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राग्निभ्यां स्वाहा। ॐ द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा। ॐ ब्रह्मणे स्वाहा। ॐ अद्भ्यः स्वाहा। ॐ ओषधिवनस्पतिभ्यः स्वाहा। ॐ गृहाय स्वाहा। ॐ देवदेवताभ्यः स्वाहा। ॐ इन्द्राय स्वाहा। ॐ इन्द्रपुरुषेभ्यः स्वाहा। ॐ यमाय स्वाहा। ॐ यमपुरुषाय स्वाहा। ॐ सर्वेभ्यो भूतेभ्यो दिवाचारिभ्यः स्वाहा। ॐ वसुधापितृभ्यः स्वाहा—इन मन्त्रोंसे अग्निमें आहुति दे। तदनन्तर 'ॐ ये भूता॑ प्रचरन्ति०'<sup>१</sup> का पाठ करते हुए बलि और पुष्टि प्रदान करनेकी प्रार्थना करे। अन्तमें 'ॐ आचाण्डालपतितवायसेभ्यो नमः' इस मन्त्रसे भी काक आदिको बलि प्रदान करे<sup>२</sup>।
(अध्याय २१६)
१-ये भूताः प्रचरन्ति दीनाश्च निमिहन्तो भुवनस्य मध्ये। तेभ्यो बलिं पुष्टिकामो ददामि मयि पुष्टिं पुष्टिपतिर्दधातु॥ (२१६।२)
२-इस अध्यायमें बलिवैश्वदेवकी विधि अन्य शाखाके अनुसार है। माध्यन्दिन शाखाके लोगोंके लिये 'पारस्करगृह्यसूत्र' के अनुसार संक्षिप्त एवं प्रामाणिक 'बलिवैश्वदेवविधि' गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' में द्रष्टव्य है।