भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४०२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

धर्मसारका कथन

श्रीब्रह्माजीने कहा— हे शंकर! अब मैं सभी पापोंका विनाश करनेवाले तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले अतिशय सूक्ष्म धर्मसारको संक्षेपमें कहता हूँ, आप सुनें।

शोक शास्त्रीय ज्ञान, धर्म, बल, धैर्य, सुख और उत्साह—इन सबका हरण कर लेता है। अर्थात् शोकके प्रभावसे सभी सात्त्विक वृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं। इसीलिये सर्वतोभावसे शोकका परित्याग करना चाहिये।

कर्म ही दारा (स्त्री) है, कर्म ही लोक है, कर्म ही सम्बन्धी है, कर्म ही बान्धव है। (अर्थात् स्त्री, लोक, सम्बन्धी एवं बान्धव आदि कर्मके अनुसार ही मिलते हैं।) कर्म ही सुख-दुःखका मूल कारण है। (अतः उत्तम कर्म करनेके लिये सदा सावधान रहना चाहिये।) दान ही परमधर्म है। दानसे ही पुरुषको सभी अभीष्ट प्राप्त होते हैं। दान ही पुरुषको स्वर्ग और राज्य प्रदान करता है। इसलिये मनुष्यको दान अवश्य करना चाहिये—

दानमेव परो धर्मो दानात्सर्वमवाप्यते।
दानात्स्वर्गश्च राज्यं च दद्याद्दानं ततो नरः॥
(२२१।४)

विधिपूर्वक प्रशस्त दक्षिणाके साथ दान तथा भयभीत प्राणीकी प्राणरक्षा—ये दोनों समान हैं। यथाविधि तपस्या, ब्रह्मचर्य, विविध यज्ञ एवं स्नानमें जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य भयभीत प्राणीके प्राणोंकी रक्षासे प्राप्त होता है। जो लोग धर्मका नाश करते हैं, वे नरकमें जाते हैं।

जो होम, जप, स्नान, देवतार्चन आदि सत्कार्यमें तत्पर रहकर सत्य, क्षमा, दया आदि सद्गुणोंसे सम्पन्न रहते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं<sup></sup>। कोई भी किसीको सुख या दुःख नहीं देता है और न किसीका सुख-दुःख हरण कर सकता है। सभी अपने किये हुए कर्मके अनुसार सुख-दुःखका भोग करते हैं—

न दाता सुखदुःखानां न च हर्तास्ति कश्चन।
भुङ्क्ते स्वकृतान्येव दुःखानि च सुखानि च॥
(२२१।८)

जो धर्मकी रक्षाके लिये जीवनदान करता है, वह सभी विषम परिस्थितियों (कठिनाइयों)-को पार कर जाता है। जिनका चित्त सदा संतुष्ट रहता है, वे फल, मूल, शाक आदिके द्वारा जीवनधारण करके भी सुखकी अनुभूति करते हैं—

धर्मार्थं जीवितं येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते।
सन्तुष्टः को न शक्नोति फलमूलैश्च वर्तितुम्॥
(२२१।९)

सुखकी लालसामें सभी मनुष्य संकटकी स्थितिमें पड़ते हैं। यह लोभका ही परिणाम है, जो अत्यन्त दुष्कर है।

मनुष्यके चित्तमें लोभ उपस्थित होनेसे ही क्रोध उत्पन्न होता है। लोभके कारण ही मनुष्य हिंसा आदि गर्हित कार्योंमें प्रवृत्त होता है। मोह, माया, अभिमान, मात्सर्य, राग, द्वेष, असत्यभाषण एवं मिथ्याचरण—ये सभी लोभसे उत्पन्न होते हैं। लोभसे ही मनुष्य मोह और मदसे उन्मत्त हो जाता है। (इसलिये लोभका परित्याग करना चाहिये) जो शान्त व्यक्ति लोभका परित्याग करता है, वह सभी प्रकारके पापोंसे रहित होकर परमलोकको प्राप्त करता है<sup></sup>


१-ये च होमजपस्नानदेवतार्चनतत्पराः। सत्यक्षमादयायुक्तास्ते नराः स्वर्गगामिनः॥ (२२१।७)
२-लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभाद् द्रोहः प्रवर्तते। लोभान्मोहश्च माया च मानो मत्सर एव च॥
रागद्वेषानृतक्रोधलोभमोहमदोज्झितः। यः स शान्तः परं लोकं याति पापविवर्जितः॥ (२२१।११-१२)