गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४०६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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हुई या महुआकी बनी हुई मदिरा पान करते हैं, उन्हें अग्निके समान संतप्त सुराका पान करके शुद्ध होना चाहिये। जो ब्राह्मण और क्षत्रिय सूतकयुक्त घरके पात्रमें जल अथवा भोजन ग्रहण कर लेते हैं, उन्हें क्रमशः पाँच सौ और एक सौ गायत्री-मन्त्रोंका जप करना चाहिये। (जब घरमें सूतक पड़ जाता है तो उस समय) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र क्रमशः—दस दिन, बारह दिन, पंद्रह दिन तथा एक मासके बाद शुद्ध हो जाते हैं। युद्धरत राजाओंकी, यज्ञदीक्षितकी तथा परदेशमें गये हुए लोगोंकी सूतक होनेपर तत्काल स्नानसे शुद्धि हो जाती है। एक मासके बालककी मृत्यु होनेपर भी स्नानसे सद्यः शुद्धिका विधान है। अविवाहित कन्या, यज्ञोपवीत-संस्काररहित द्विज, दाँत निकल आये हुए बालक तथा तीन वर्षीया कन्याकी मृत्यु होनेपर तीन रात्रियोंका अशौच होता है। जननाशौचमें गर्भस्राव होनेपर भी तीन रात्रियोंका अशौच माताके लिये माना गया है। प्रसूता स्त्रियाँ एक मासतक अशुद्ध रहती हैं। रजस्वला स्त्री चौथे दिन शुद्ध हो जाती है।
देशमें दुर्भिक्ष एवं किसी आकस्मिक कारणवश विप्लव होनेकी स्थितिमें जन्म अथवा मृत्युका अशौच होनेपर भी देशहितके लिये दान आदि धर्म यथानियम किये जा सकते हैं। दीक्षाकालमें, विवाहादिमें, देव-पितृनिमन्त्रणमें, देवताओं तथा ब्राह्मणोंके निमन्त्रित हो जानेपर या पूर्व संकल्पित कार्योंके बीच भी यदि घरके किसी व्यक्तिकी मृत्यु हो जाती है अथवा कोई बच्चा जन्म लेता है तो उस समय अशौच नहीं होता है। द्विज प्रसूता पत्नीका स्पर्श करनेसे अशौचयुक्त हो जाता है। जहाँ अग्नियोंका आवाहन होता है, जहाँ वेदोंका पठन-पाठन होता है अथवा जहाँ वैश्वदेव, यज्ञ आदि धार्मिक कृत्योंका सम्पादन होता है, वहाँ सूतक-दोष नहीं होता।
अशुद्ध घरमें भोजन करनेपर ब्राह्मण तीन रात्रि उपवासके पश्चात् शुद्ध होता है। यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रकी स्त्री रजस्वला हो जाय और परस्पर एक-दूसरेका स्पर्श करे तो ब्राह्मणी तीन रातमें, क्षत्रियकी स्त्री दो रातमें, वैश्यकी स्त्री एक दिनमें उपवास करनेके पश्चात् शुद्ध होती है। शूद्रकी स्त्री तो सद्यः स्नान करनेके बाद ही शुद्ध हो जाती है।
कुत्ते, सियार और बन्दरको कुएँमें गिरा हुआ देखकर उस कूपका जल पीनेसे ब्राह्मण तीन दिन, क्षत्रिय दो दिन तथा वैश्य एक दिनके उपवासके पश्चात् शुद्ध होता है। यदि कुएँमें हड्डी, चमड़ा, किसी प्रकारका मल या चूहा आदि गिर जाय तो उसे कुएँसे बाहर निकाल कर कुएँका कुछ जल निकाल देना चाहिये तथा पञ्चगव्य डालकर कुएँको शुद्ध करना चाहिये। यदि तडाग या पुष्करिणी आदिका जल दूषित हो गया हो तो उसमें शुद्ध भस्मादि डाल देना चाहिये और छः घड़ा जल उसमेंसे निकालकर पञ्चगव्य डाल देना चाहिये। ऐसा करनेसे वह शुद्ध हो जाता है। यदि रजस्वला स्त्रीका रजःस्राव कूपजलके मध्य हो जाता है तो उसमेंसे तीस घड़ा जल निकाल देना चाहिये।
अगम्या स्त्रीका गमन, मद्य तथा गोमांसका भक्षण करके ब्राह्मण चान्द्रायणव्रत, क्षत्रिय प्राजापत्यव्रत, वैश्य सान्तपनव्रत करनेसे और शूद्र पाँच दिन उपवासके बाद शुद्ध हो जाता है, किंतु प्रायश्चित्त करनेके बाद ऐसे सभी व्यक्तियोंके लिये अपेक्षित है कि वे गोदान करें और ब्राह्मणभोजन भी करायें। क्रीड़ा तथा शयनादिके समय नील लगा हुआ वस्त्र दूषित नहीं होता। (अन्य कार्योंमें तो) नील लगे हुए वस्त्रोंका स्पर्श नहीं करना चाहिये। ऐसे वस्त्रोंको धारण करनेवाले नरकमें जाते हैं।