भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 634 में से

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काण्ड ] विष्णुभक्तिका माहात्म्य ४२३


होती है। फिर ज्ञानसम्पन्न मनुष्योंकी गतिके विषयमें कहना ही क्या—
कीटपक्षिगणानां च हरौ संन्यस्तचेतसाम्।
ऊर्ध्व्वा ह्येव गतिश्चास्ति किं पुनर्ज्ञानिनां नृणाम्॥
(२३०।३०)

भगवान् वासुदेवरूपी वृक्षकी छाया न तो अधिक शीतल होती है और न अधिक तापकारक होती है। नरकके द्वारका शमन करनेवाली (नरकमें जानेसे रोकने-वाली) इस छायाका सेवन क्यों नहीं किया जाय—
वासुदेवतरुच्छाया नातिशीतातितापदा।
नरकद्वारशमनी सा किमर्थं न सेव्यते॥
(२३०।३१)

हे मित्र! भगवान् मधुसूदनको अपने हृदयमें अहर्निश प्रतिष्ठित रखनेवाले प्राणीका विनाश करनेमें न तो महाक्रोधी दुर्वासाका शाप समर्थ है और न तो देवराज इन्द्रका शासन ही समर्थ है—
न च दुर्वाससः शापो राज्यं चापि शचीपतेः।
हन्तुं समर्थं हि सखे हृत्कृते मधुसूदने॥
(२३०।३२)

बोलते हुए, रुकते हुए अथवा इच्छानुसार अन्य कार्य करते हुए भी यदि भगवद्विषयक चिन्तन निरन्तर बना रहे तो धारणा (ध्येयपर चित्तकी स्थिरता)-को सिद्ध हुआ मानना चाहिये—
वदतस्तिष्ठतोऽन्यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः।
नापयाति यदा चिन्ता सिद्धां मन्येत धारणाम्॥
(२३०।३३)

सूर्यमण्डलके मध्य विराजमान रहनेवाले, कमलासनपर सुशोभित, केयूर*, मकराकृतकुण्डल और मुकुटसे अलंकृत, दिव्य हारसे युक्त, मनोहारिणी सुन्दर स्वर्णिम आभासे युक्त शरीरवाले, शंख-चक्रधारी भगवान् विष्णुका सदैव ध्यान करना चाहिये—
ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती
नारायणः सरसिजासनसंनिविष्टः।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी
हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥
(२३०।३४)

इस संसारमें भगवान्‌के ध्यानके समान अन्य कोई पवित्र कार्य नहीं है। श्रीविष्णुके ध्यानमें ही सदा निरत रहनेवाला मनुष्य चाण्डालका भी अन्न खाते हुए इस संसारके पापसे संलिप्त नहीं होता, क्योंकि ऐसा मनुष्य अपने स्वत्वको भगवान्‌में लीन कर देनेसे भगवन्मय हो जाता है, अतएव उसकी भेददृष्टि पूरी तरह निर्मूल हो जाती है।

प्राणीका चित्त सदा सांसारिक विषयवासनाओंके भोगमें जिस प्रकार अनुरक्त रहता है, यदि उसी प्रकार नारायणमें ही अनुरक्त हो तो इस संसारके बन्धनसे क्यों नहीं विमुक्त हो सकता—
सदा चित्तं समासक्तं जन्तोर्विषयगोचरे।
यदि नारायणेऽप्येवं को न मुच्येत बन्धनात्॥
(२३०।३६)

सूतजीने फिर कहा—हे शौनक! सर्वदा जिसके चित्तमें भगवान् विष्णुकी भक्ति विद्यमान रहती है, वह प्रतिक्षण श्रीविष्णुको ही नमन करता रहता है। इस स्थितिमें वह हरिकृपासे अपनेको पापके समुद्रसे तार लेता है।

वही ज्ञान है जिस ज्ञानका विषय गोविन्द हों, वही कथा है जिस कथामें केशवकी लीला हो, वही कर्म है जो प्रभुके निमित्त किया जाय; अन्य बहुत-सी बातोंको कहनेसे क्या लाभ? जो जिह्वा हरिकी स्तुति करती है वही जिह्वा है, जो चित्त श्रीहरिको समर्पित है वही चित्त है तथा भगवान्‌की पूजा करनेमें जो हाथ लगे हुए हैं वे ही वास्तविक हाथ हैं—


* बाँहके मूलमें पहना जानेवाला आभूषण, इसे अङ्गद, बिजायट, बाजूबंद आदि भी कहते हैं।

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