गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 442, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ें४३२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
यज्ञीय दीक्षा, यज्ञयूप, अग्नि, यजमानपत्नी, पुरोडाश, यज्ञशाला, स्रुक्, स्रुव तथा सोमरस निकालनेके लिये प्रयुक्त पाषाणविशेष हैं। आप सब कुछ हैं। आप ही यज्ञकी सम्पन्नताके लिये दक्षिणायुक्त सदस्य और आप ही यज्ञके सम्पादनके लिये उपयोगी शूर्पादिक उपकरण, ब्रह्मा (विशेष ऋत्विक्), मूसल तथा ओखली हैं। आप ही निश्चितरूपमें होता, यजमान, धान्य, पशु, याजक, अध्वर्यु, उद्गाता, यज्ञ और आप ही पुरुषोत्तम यज्ञभगवान् हैं। आपको मेरा नमस्कार है।
हे देव! आप ही दिशा, पाताल, पृथ्वी, आकाश, स्वर्ग एवं नक्षत्रोंके जन्मदाता हैं। आप ही देव, तिर्यक् तथा मनुष्य आदि हैं। यह चराचर जगत् भी आप ही हैं। यह अखिल ब्रह्माण्ड और जगत् आपका ही स्वरूप है। इन सबको सृष्टिके लिये आपने स्वतः प्रकट किया है। हे परब्रह्म! यह आपका स्वरूप उन देवताओंके भी ज्ञानसे परे है। इस संसारमें कौन ऐसा प्राणी है, जो निष्कलुष, योगगम्य, इन्द्रियातीत, अक्षय, पुराणपुरुष, नित्य, अव्यक्त, अजन्मा, अव्यय, प्रलय और उत्पत्तिसे रहित, सर्वव्यापक, ईश्वर, सर्वज्ञ, निर्गुण, शुद्ध, परमानन्द, अजर, बोधरूप, अटल, शान्त, पूर्ण, अद्वैत तथा अक्षर ब्रह्म आपको जान सकता है। हे देव! अवतारोंमें आपके जिस स्वरूपका दर्शन होता है, उसके परम भावको बिना जाने हुए ही देवता लोग आपका भजन करते हैं। वे भी आपके मूलस्वरूपके दर्शनसे वञ्चित रह जाते हैं। हे पुरुषोत्तम! इस प्रकार आपका मनसे भी अगम्य जो अगोचर सूक्ष्मस्वरूप है, उसकी आराधना करनेमें क्या मैं समर्थ हो सकता हूँ?
हे नाथ! यहाँपर इस पूजामण्डलमें यथाविधि पुष्प-धूप आदिके द्वारा संकर्षण आदि नामभेदोंसे आपकी ही मैंने पूजा की है, ये सभी विभूतियाँ आपकी ही हैं। मैंने आपकी इस पूजामें जो कुछ किया है और जो कुछ नहीं किया है, वह सब आप क्षमा करें। हे विभो! यथोक्त रूपसे मैं आपकी सम्यक् पूजा नहीं कर सकता। जो मैंने जप-होमादि किया है, भक्तिपूर्वक उस कार्यका निष्पादन करना मेरे लिये असाध्य है। इसलिये मैं आपसे क्षमा-प्रार्थना करता हूँ। हे प्रभो! दिन, रात और संध्यामें तथा सभी अवस्थाओंमें मेरी चेष्टा-निष्ठा आपकी सेवाके अनुरूप रहे। हे हरे! आपके चरणयुगलमें मेरी एकनिष्ठ अचल भक्ति हो। हे नाथ! मेरी जैसी प्रीति अपने शरीरसे है, वैसी धर्मादि कार्योंमें नहीं। इसलिये हे जगन्नाथ! आप ऐसी कृपा करें कि आपमें मेरी आत्यन्तिकी प्रीति हो जाय। सभी फल देनेवाले भगवान् विष्णुकी जिसने दृढ़ भक्ति कर ली, उसने स्वर्ग और मोक्ष आदिके साधन किन कर्मोंको नहीं किया है? हे अच्युत! आपके पूजन और स्तुति करनेमें कौन समर्थ है? आज मैंने यथासामर्थ्य आपकी जो पूजा और स्तुति की है, उसकी अपूर्णताके लिये मुझे क्षमा प्रदान करें। मेरा आपको प्रणाम है।
हे मुने! मैंने भली प्रकारसे आपको यह चक्रधर (अच्युत)-स्तोत्र सुना दिया है। यदि आप परम वैष्णव पदकी इच्छा करते हैं तो परात्पर विष्णुकी भक्तिपूर्वक यह स्तुति करें।
पूजाके समय जो मनुष्य इस स्तोत्रके द्वारा जगद्गुरु भगवान् विष्णुकी स्तुति करता है, वह शीघ्र ही संसारके बन्धनको काटकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। हे मुने! अन्य जो कोई भी पवित्र होकर भक्तिपूर्वक प्रतिदिन तीनों संध्याओंमें श्रीविष्णुदेवका इस स्तोत्रके अनुसार भजन करता है, वह अपने समस्त अभीष्टोंकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है। इस स्तोत्रका पाठ करनेसे पुत्र चाहनेवाला व्यक्ति पुत्र प्राप्त करता है, सांसारिक बन्धनसे मुक्त होनेकी