गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आत्मज्ञाननिरूपण
श्रीभगवान् बोले—हे नारद! अब मैं आत्मज्ञानका तात्त्विक वर्णन करूँगा, सुनिये।
अद्वैत तत्त्व ही सांख्य है और उसमें एकचित्तता ही योग है। जो अद्वैत तत्त्व-योगसे सम्पन्न हैं, वे भवबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। अद्वैत तत्त्वका ज्ञान होनेपर अतीत, वर्तमान और भविष्यके सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। ज्ञानी व्यक्ति सद्विचाररूपी कुल्हाड़ीके द्वारा संसाररूपी वृक्षको काटकर ज्ञान-वैराग्यरूपी तीर्थके द्वारा वैष्णव पद प्राप्त करता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—यह तीन प्रकारकी अवस्था ही माया है जो संसारका मूल है। यह माया जबतक रहती है, तबतक संसार ही सत्यमें अवगत होता है। वास्तवमें शाश्वत अद्वैत तत्त्वमें ही सब कुछ प्रविष्ट है। अद्वैत तत्त्व ही परब्रह्म है। यह परब्रह्म नाम-रूप तथा क्रियासे रहित है। यह ब्रह्म ही इस जगत्की सृष्टि कर स्वयं उसीमें प्रविष्ट हो जाता है।
'मैं मायातीत चित्पुरुषको जानता हूँ और मैं भी आत्मस्वरूप हूँ।' इस प्रकारका ज्ञान ही मुक्तिका मार्ग है। मोक्ष-लाभके लिये इससे अतिरिक्त अन्य कोई भी उपाय नहीं है*। श्रवण, मनन और ध्यान—ये सभी ज्ञानके साधन हैं। यज्ञ, दान, तपस्या, वेदाध्ययन और तीर्थसेवामात्रसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं होती है। मुक्ति किसी मतसे दान-ध्यानसे तथा किसीके मतसे पूजादि कर्मोंसे होती है। 'कर्म करो' और 'कर्मका त्याग करो'—ये दोनों वचन वेदमें मिलते हैं। निष्कामभावसे यज्ञादि कर्म मुक्तिके लिये होते हैं, क्योंकि निष्कामभावसे अनुष्ठित यज्ञादि अन्तःकरणकी शुद्धिके साधन हैं। ज्ञान प्राप्त होनेपर एक ही जन्ममें मुक्ति प्राप्त हो जाती है। द्वैत (भेद)-भाव रखनेपर तो मुक्ति सम्भव ही नहीं है। कुयोगी भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते। किसी कारण योगभ्रष्ट होनेपर योगियोंके कुलमें उत्पत्ति हो सकती है। ऐसी स्थितिमें मुक्ति सम्भव है।
कर्मोंसे भवबन्धन और ज्ञान होनेसे जीवकी संसारसे मुक्ति हो जाती है, इसलिये आत्मज्ञानका आश्रय करना चाहिये। जो आत्मज्ञानसे भिन्न ज्ञान हैं, उनको भी अज्ञान कहा जाता है। जब हृदयमें स्थित सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब जीव जीवनकालमें ही अमरत्वकी प्राप्ति कर लेता है, इसमें संशय नहीं है—
यदा सर्वे विमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः।
तदाऽमृतत्वमाप्नोति जीवन्नेव न संशयः॥
(२३६। १२)
व्यापक होनेसे ब्रह्म कैसे जाता है, कौन जाता है और कहाँ जाता है? ऐसे प्रश्नोंके लिये कोई अवसर ही नहीं है। अनन्त होनेके कारण उसका कोई देश नहीं है; अतः किसी भी रूपमें उसकी गति नहीं हो सकती। परब्रह्म अद्वय है, अतः उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। वह ज्ञानस्वरूप है, अतः उसमें जड़ता कैसे हो सकती है? वस्तुतः ब्रह्म आकाशके समान है, इसलिये उसकी गति, अगति और स्थिति आदिका विचार कैसे हो सकता है? जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था मायाके द्वारा कल्पित हैं अर्थात् मिथ्या हैं।
वस्तुमात्रका सार ब्रह्म ही है। तेजोरूप ब्रह्मको एक अखण्ड परम पुण्यरूप समझना चाहिये। जैसे अपनी आत्मा सबको प्रिय है, वैसे ही ब्रह्म सबको प्रिय है क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है। हे महामुने!
* वेदाहमेतं पुरुषं चिद्रूपं तमसः परम्। सोऽहमस्मीति मोक्षाय नान्यः पन्था विमुक्तये॥ (२३६। ६)