भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] ब्रह्मगीतासार ४४१


साधुगण इस प्रकारके इन्द्रिय-निरोधको प्रत्याहार कहते हैं। मूर्त और अमूर्त ब्रह्म-चिन्तनको ध्यान कहा जाता है। योगारम्भके समय मूर्तिमान् और अमूर्तरूपमें हरिका ध्यान करना चाहिये।

तेजोमण्डलके मध्यमें शंख, चक्र, गदा तथा पद्मधारी चतुर्भुज—कौस्तुभचिह्नसे विभूषित, वनमाली, वायुस्वरूप जो ब्रह्म अधिष्ठित है ‘मैं वही हूँ’। इस प्रकार मनका लय करके श्रीहरिको धारण करना ही धारणा है। ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ और ‘ब्रह्म ही मैं हूँ’ इस प्रकार देशालम्बन-रहित अहं और ब्रह्म पदार्थका तादात्म्य रूप ही समाधि है। (अध्याय २३८)


ब्रह्मगीतासार

ब्रह्माजीने कहा— [हे नारद!] अब मैं ब्रह्मगीतासारका वर्णन करूँगा, जिसे जानकर संसारसे मुक्ति हो जाती है।

‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस वाक्यार्थका ज्ञान होनेसे मनुष्योंको मोक्षकी प्राप्ति होती है। मैं और ब्रह्म—इन दो पदोंके अर्थका ज्ञान होनेपर वाक्यका ज्ञान होता है। विद्वानोंने इन पदोंके अर्थको वाच्य तथा लक्ष्य-रूपमें दो प्रकारका स्वीकार किया है। वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थसे मिला-जुला वाक्यार्थ ही शुद्ध वाक्यार्थ है। वेदोंके द्वारा अहं शब्दसे एक प्राणपिण्डात्मक और दूसरा प्रत्यग्-रूप आत्मा गृहीत होता है। अव्यानन्द चैतन्य परोक्षज्ञानके सहित है और प्राण-पिण्डात्मक चैतन्य उसका दूसरा पक्ष है। अहं पदकी लक्षणासे आत्माका अल्पज्ञत्वादि दोषरहित शुद्ध आत्मा अर्थ होता है।

जो प्राणपिण्डात्मक अर्थ है वह उसका दूसरा भाग है। इसमें परोक्ष अर्थात् लक्ष्यार्थको देखनेके पश्चात् जैसे उस अर्थकी स्थिति आती है, वैसे ही ब्रह्मपदसे प्राणपिण्डात्मक अर्थकी प्रतीति होती है। निष्ठा तथा परोक्षता आदि अर्थ-प्रतीतिके जो गुण हैं, उनका परित्याग करके ऐसा अर्थ किया जाता है। अद्वयानन्द चैतन्य इस अर्थकी प्राप्ति तो लक्ष्यार्थ ब्रह्मपदसे ही हो जाती है। अद्वयानन्द चैतन्यको लक्ष्यार्थ रूपमें देखकर ‘मैं ब्रह्म हूँ’—इन दोनों पदार्थोंकी सिद्धि ‘ब्रह्म मैं हूँ’ और ‘मैं ब्रह्म हूँ’—इन दो स्थितियोंमें होती है। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस वाक्यसे स्वानुभूतिका फलार्थ प्राणीको प्राप्त होता है। ऐक्यज्ञान तो निश्चित ही वेदान्तसे होता है। उससे यह अर्थ परे है। ज्ञानसे अज्ञानकी जो निवृत्ति होती है, उस निवृत्तिके बाद प्राणीके चित्तकी लक्ष्यसे जो ऐक्यकी स्थिति उत्पन्न होती है, वही मुक्ति है। (अध्याय २३९)


ब्रह्मगीतासार

श्रीभगवान्ने कहा— [हे पाण्डव!] यह सिद्ध है कि परमात्मा है। उसी परमात्मासे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल तथा जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है, जो इस जगत्-प्रपञ्चकी जन्मदात्री है। तदनन्तर सत्रह तत्त्व उत्पन्न हुए। वाक्, हाथ, पैर, पायु और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा तथा नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान नामक पाँच प्रकारकी वायु है। मन और बुद्धिरूप अन्तःकरण है। मन