गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीपरमात्मने नमः
धर्मकाण्ड—प्रेतकल्प
वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्योंके बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम
श्रीगणेशजीको नमस्कार है। 'ॐ' कारसे युक्त भगवान् वासुदेव हरिको प्रणाम है।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥
भगवान् श्रीनारायण, नरोत्तम नर एवं भगवती श्रीसरस्वती देवीको नमस्कार करके पुराणका वाचन करना चाहिये। जिन भगवान्का धर्म ही मूल है, वेद जिनका स्कन्ध है, पुराणरूपी शाखासे जो समृद्ध हैं, यज्ञ जिनके पुष्प हैं, मोक्ष जिनका फल है—ऐसे भगवान् मधुसूदनरूपी कल्पवृक्षकी जय हो।
देवक्षेत्र नैमिषारण्यमें शौनकादिक श्रेष्ठ मुनियोंने सुखपूर्वक विराजमान श्रीसूतजी महाराजसे कहा—
हे श्रीसूतजी! आप श्रीवेदव्यासजीकी कृपासे सब कुछ जानते हैं। अतः आप हम सभीके संदेहका निवारण करें। कुछ लोगोंका कहना है कि जिस प्रकार कोई जोंक तिनकेसे तिनकेका सहारा लेकर आगे बढ़ती है, उसी प्रकार शरीरधारी जीव एक शरीरके बाद दूसरे शरीरका आश्रय ग्रहण करता है। दूसरे विद्वानोंका कहना है कि प्राणी मृत्युके पश्चात् यमराजकी यातनाओंका भोग करता है, तदनन्तर उसको दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है—इन दोनोंमें क्या सत्य है? यह हमें बतानेकी कृपा करें।
सूतजीने कहा—हे महाभाग! आप लोगोंने अच्छा प्रश्न किया है। आप लोगोंको संदेह हो यह असम्भव है। आप लोगोंने तो लोकहितसे प्रेरित होकर ही ऐसा प्रश्न किया है। हे विप्रगणो! मैं आप सबके हृदयमें अवस्थित उस संदेहको भगवान् श्रीकृष्ण और गरुडके बीच हुए संवादके द्वारा दूर करूँगा। सर्वप्रथम मैं उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ, जिनका आश्रय लेकर मनुष्य इस भवसागरको एक क्षुद्र नदीकी भाँति अनायास ही पार कर जाते हैं।