भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 458
४४८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

विधान क्यों है ? दसवें दिन सभी परिजनोंके साथ शुद्धिके लिये स्नान क्यों किया जाता है ? दसवें दिन तेल एवं उबटनका प्रयोग क्यों किया जाता है। उस तेल और उबटनका प्रयोग भी एक विशाल जलाशयके तटपर होना अपेक्षित है, इसका क्या कारण है ? दसवें दिन पिण्डदान क्यों करना चाहिये ? एकादशाहके दिन वृषोत्सर्ग आदिके सहित पिण्डदान करनेका क्या प्रयोजन है ? पात्र, पादुका, छत्र, वस्त्र तथा अंगूठी आदि वस्तुओंका दान क्यों दिया जाता है ? तेरहवें दिन पददान क्यों दिया जाता है। वर्षपर्यन्त सोलह श्राद्ध क्यों किये जाते हैं तथा तीन सौ साठ सान्नोदक घट क्यों दिये जाते हैं। प्रेततृप्तिके लिये प्रतिदिन अन्नसे भरे हुए एक घटका दान क्यों करना चाहिये।

हे प्रभो ! मनुष्य अनित्य है और समय आनेपर ही वह मरता है, किंतु मैं उस छिद्रको नहीं देख पाता हूँ, जिससे जीव निकल जाता है ? प्राणीके शरीरमें स्थित किस छिद्रसे पृथ्वी, जल, मन, तेज, वायु और आकाश निकल जाते हैं ? हे जनार्दन ! इसी शरीरमें स्थित जो पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच वायु हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं। लोभ, मोह, तृष्णा, काम और अहंकाररूपी जो पाँच चोर शरीरमें छिपे रहते हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं।

हे माधव ! प्राणी अपने जीवनकालमें पुण्य अथवा पाप जो कुछ भी कर्म करता है, नाना प्रकारके दान देता है, वे सब शरीरके नष्ट हो जानेपर उसके साथ कैसे चले जाते हैं। वर्षके समाप्त हो जानेपर भी मरे हुए प्राणीके लिये सपिण्डीकरण क्यों होता है ? उस प्रेतकृत्यमें (सपिण्डन) प्रेतपिण्डका मिलन किसके साथ किस विधिसे होना चाहिये, इसे आप बतानेकी कृपा करें।

हे हरे ! मूर्च्छासे अथवा पतनसे जिनकी मृत्यु होती है, उनके लिये क्या होना चाहिये। जो पतित मनुष्य जलाये गये अथवा नहीं जलाये गये तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य प्राणी हैं, उनके मरनेपर अन्तमें क्या होना चाहिये। जो मनुष्य पापी, दुराचारी अथवा हतबुद्धि हैं, मरनेके बाद वे किस स्थितिको प्राप्त करते हैं ? जो पुरुष आत्मघाती, ब्रह्महत्यारा, स्वर्णादिकी चोरी करनेवाला, मित्रादिके साथ विश्वासघात करनेवाला है, उस महापातकीका क्या होता है ? हे माधव ! जो शूद्र कपिला गौका दूध पीता है अथवा प्रणव महामन्त्रका जप करता है या ब्रह्मसूत्र अर्थात् यज्ञोपवीतको धारण करता है तो मृत्युके बाद उसकी क्या गति होती है ? हे संसारके स्वामी ! जब कोई शूद्र किसी ब्राह्मणीको पत्नी बना लेता है तो उस पापीसे मैं भी डरता हूँ। आप बतायें कि उस पापीकी क्या दशा होती है ? साथ ही उस पापकर्मके फलको बतानेकी भी कृपा करें।

हे विश्वात्मन् ! आप मेरी दूसरी बातपर भी ध्यान दें। मैं कौतूहलवश वेगपूर्वक लोकोंको देखता हुआ सम्पूर्ण जगत्में जा चुका हूँ, उसमें रहनेवाले लोगोंको मैंने देखा है कि वे सभी दुःखमें ही डूब रहे हैं। उनके अत्यन्त कष्टोंको देखकर मेरा अन्तःकरण पीड़ासे भर गया है। स्वर्गमें दैत्योंकी शत्रुतासे भय है। पृथ्वीलोकमें मृत्यु और रोगादिसे तथा अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे लोग दुःखित हैं। पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियोंको मेरे भयसे दुःख बना रहता है*। हे ईश्वर ! आपके इस वैष्णव पद (वैकुण्ठ)-के अतिरिक्त अन्यत्र किसी भी लोकमें ऐसी निर्भयता नहीं दिखायी देती। कालके वशीभूत इस जगत्की स्थिति स्वप्नकी मायाके समान असत्य है। उसमें भी इस भारतवर्षमें


* पाताललोकमें नागोंको गरुडका भय रहता है।