गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| काण्ड ] | विष्णुसहस्रनाम | ३७ |
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| शुकश्च ( सुभ्रूः ) सुकिरीटी च सुग्रीवः कौस्तुभस्तथा। | सूक्ष्मश्चैव सुसूक्ष्मश्च स्थूलात्स्थूलतरस्तथा॥ |
| प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च हयग्रीवश्च सूकरः॥ | विशारदो बलाध्यक्षः सर्वस्य क्षोभकस्तथा। |
| मत्स्यः परशुरामश्च प्रह्लादो बलिरेव च। | प्रकृतेः क्षोभकश्चैव महतः क्षोभकस्तथा॥ |
| शरण्यश्चैव नित्यश्च बुद्धो मुक्तः शरीरभृत्॥ | भूतानां क्षोभकश्चैव बुद्धेश्च क्षोभकस्तथा। |
| खरदूषणहन्ता च रावणस्य प्रमर्दनः। | इन्द्रियाणां क्षोभकश्च विषयक्षोभकस्तथा॥ |
| सीतापतिश्च वर्धिष्णुर्भरतश्च तथैव च॥ | ब्रह्मणः क्षोभकश्चैव रुद्रस्य क्षोभकस्तथा। |
| कुम्भेन्द्रजिन्निहन्ता च कुम्भकर्णप्रमर्दनः। | अगम्यश्चक्षुरादेश्च श्रोत्रागम्यस्तथैव च॥ |
| नरान्तकान्तकश्चैव देवान्तकविनाशनः॥ | त्वचा न गम्यः कूर्मश्च जिह्वाग्राह्यस्तथैव च। |
| दुष्टासुरनिहन्ता च शम्बरारिस्तथैव च। | घ्राणेन्द्रियागम्य एव वाचाऽग्राह्यस्तथैव च॥ |
| नरकस्य निहन्ता च त्रिशीर्षस्य विनाशनः॥ | अगम्यश्चैव पाणिभ्यां पदागम्यस्तथैव च। |
| यमलार्जुनभेत्ता च तपोहितकरस्तथा। | अग्राह्यो मनसश्चैव बुद्ध्याऽग्राह्यो हरिस्तथा॥ |
| वादित्रं चैव वाद्यं च बुद्धश्चैव वरप्रदः॥ | अहं बुद्ध्या तथा ग्राह्यश्चेतसा ग्राह्य एव च। |
| सारः सारप्रियः सौरः कालहन्तृनिकृन्तनः। | शङ्खपाणिश्चाव्ययश्च गदापाणिस्तथैव च॥ |
| अगस्त्यो देवलश्चैव नारदो नारदप्रियः॥ | शार्ङ्गपाणिश्च कृष्णश्च ज्ञानमूर्तिः परन्तपः। |
| प्राणोऽपानस्तथा व्यानो रजः सत्त्वं तमः शरत्। | तपस्वी ज्ञानगम्यो हि ज्ञानी ज्ञानविदेव च॥ |
| उदानश्च समानश्च भेषजं च भिषक् तथा॥ | ज्ञेयश्च ज्ञेयहीनश्च ज्ञप्तिश्चैतन्यरूपकः। |
| कूटस्थः स्वच्छरूपश्च सर्वदेहविवर्जितः। | भावो भाव्यो भवकरो भावनो भवनाशनः॥ |
| चक्षुरिन्द्रियहीनश्च वागिन्द्रियविवर्जितः॥ | गोविन्दो गोपतिर्गोपः सर्वगोपीसुखप्रदः। |
| हस्तेन्द्रियविहीनश्च पादाभ्यां च विवर्जितः। | गोपालो गोगतिश्चैव गोमतिर्गोधरस्तथा॥ |
| पायूपस्थविहीनश्च महातापविवर्जितः॥ | उपेन्द्रश्च नृसिंहश्च शौरिश्चैव जनार्दनः। |
| प्रबोधेन विहीनश्च बुद्ध्या चैव विवर्जितः। | आरणेयो बृहद्भानुर्बृहद्दीप्तिस्तथैव च॥ |
| चेतसा विगतश्चैव प्राणेन च विवर्जितः॥ | दामोदरस्त्रिकालश्च कालज्ञः कालवर्जितः। |
| अपानेन विहीनश्च व्यानेन च विवर्जितः। | त्रिसन्ध्यो द्वापरं त्रेता प्रजाद्वारं त्रिविक्रमः॥ |
| उदानेन विहीनश्च समानेन विवर्जितः॥ | विक्रमो दण्ड ( र ) हस्तश्च ह्येकदण्डी त्रिदण्डधृक्। |
| आकाशेन विहीनश्च वायुना परिवर्जितः। | सामभेदस्तथोपायः सामरूपी च सामगः॥ |
| अग्निना च विहीनश्च उदकेन विवर्जितः॥ | सामवेदो ह्यथर्वश्च सुकृतः सुतरूपणः। |
| पृथिव्या च विहीनश्च शब्देन च विवर्जितः। | अथर्ववेदविच्चैव ह्यथर्वाचार्य एव च॥ |
| स्पर्शेन च विहीनश्च सर्वरूपविवर्जितः॥ | ऋग्रूपी चैव ऋग्वेद ऋग्वेदेषु प्रतिष्ठितः। |
| रागेण विगतश्चैव अघेन परिवर्जितः। | यजुर्वेत्ता यजुर्वेदो यजुर्वेदविदेकपात्॥ |
| शोकेन रहितश्चैव वचसा परिवर्जितः॥ | बहुपाच्च सुपाच्चैव तथैव च सहस्रपात्। |
| रजोविवर्जितश्चैव विकारैः षड्भिरेव च। | चतुष्पाच्च द्विपाच्चैव स्मृतिर्नार्यो यमो बली॥ |
| कामेन वर्जितश्चैव क्रोधेन परिवर्जितः॥ | संन्यासी चैव संन्यासश्चतुराश्रम एव च। |
| लोभेन विगतश्चैव दम्भेन च विवर्जितः। | ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः॥ |