भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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प्रेतकल्प ]
आशौचमें विहित कृत्य, आशौचकी अवधि तथा दशगात्रविधि
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नहीं करने देते। उसके पुत्रोंके द्वारा स्नेहपूर्वक अथवा अन्य किसीके द्वारा कृपापूर्वक पृथ्वीपर जो मासिक पिण्डदान दिया जाता है, उसीको वह वहाँपर खाता है।

तदनन्तर वहाँसे उसकी यात्रा सौरिपुरके लिये होती है। चलता हुआ वह मार्गमें यमदूतोंके द्वारा मुद्गरोंसे पीटा जाता है। उस दुःखसे अत्यधिक पीड़ित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है—

जलाशयो नैव कृतो मया तदा
मनुष्यतृप्त्यै पशुपक्षितृप्तये।
गोतृप्तिहेतोर्न च गोचरः कृतः
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१००)

उस जन्ममें मनुष्य और पशु-पक्षियोंकी संतुष्टिके लिये मैंने जलाशय नहीं खुदवाया। गौओंकी क्षुधा-शान्तिके लिये गोचरभूमिका दान भी मैंने नहीं दिया। अतः हे शरीर! जैसा तुमने किया है, उसीके अनुसार अब तुम अपना निस्तार करो।

उस सौरिपुरमें कामरूपधारी इच्छानुसार स्थितिशील एवं गतिशील राजा राज्य करता है। उसका दर्शनमात्र करनेसे जीव भयसे काँप उठता है और अपने अनिष्टकी शंकासे ग्रस्त होकर त्रिपक्षमें पुत्रादिक स्वजनोंके द्वारा पृथ्वीपर दिये गये जलयुक्त पिण्डको खाकर आगे बढ़ता है। वहाँसे वह आगे बढ़ता हुआ मार्गमें यमदूतोंके खड्गप्रहारसे अत्यन्त पीड़ित होकर इस प्रकार प्रलाप करता है—

न नित्यदानं न गवाह्निकं कृतं
पुस्तं च दत्तं न हि वेदशास्त्रयोः।
पुराणदृष्टो न हि सेवितोऽध्वा
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१०३)

हे शरीर! मैंने जलादिका सदा दान नहीं दिया है, न तो नियमसे प्रतिदिन गायके लिये अपेक्षित गोग्रास आदि कृत्य किया है और न तो वेदशास्त्रकी पुस्तकका ही दान किया है। पुराणमें देखे हुए मार्ग (तीर्थयात्रा आदि)-का मैंने सेवन नहीं किया है, इसलिये जैसा तुमने किया है, उसीमें अपना निस्तार करो।

इसके बाद जीव 'नगेन्द्रनगर'में जाता है। वहाँपर वह अपने बन्धु-बान्धवोंके द्वारा दूसरे महीनेमें दिये गये अन्नको खाकर आगेकी ओर प्रस्थान करता है। चलते हुए उसके ऊपर यमदूतोंद्वारा कृपाणकी मुठियोंसे प्रहार किये जानेपर वह इस प्रकार प्रलाप करता है—

पराधीनमभूत् सर्वं मम मूर्खशिरोमणेः॥
महता पुण्ययोगेन मानुष्यं लब्धवानहम्।
(५।१०५-१०६)

बहुत बड़े पुण्योंको करनेके पश्चात् मुझे मनुष्य-योनि प्राप्त हुई थी, किंतु मुझ मूर्खाधिराजका सब कुछ पराधीन हो गया अर्थात् मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी मैं कुछ सत्कर्म न कर सका।

इस प्रकार विलाप करता हुआ जीव तीसरे मासके पूरा होते ही गन्धर्वनगरमें पहुँच जाता है। तदनन्तर समर्पित किये गये तृतीय मासिक पिण्डको वहाँ खाकर वह पुनः आगेकी ओर चल देता है। मार्गमें यमदूत उसको कृपाणके अग्रभागसे मारते हैं, जिससे आहत होकर वह पुनः इस प्रकार विलाप करता है—

मया न दत्तं न हुतं हुताशने
तपो न तप्तं हिमशैलगाह्वरे।
न सेवितं गाङ्गमहो महाजलं
शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
(५।१०८)

मैंने कोई दान नहीं दिया, अग्निमें आहुति नहीं डाली और न तो हिमालयकी गुफामें जाकर तप

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