गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४८४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड— |
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हूँ। हे कृपानिधान! महाभाग! ऋषिवर! मुझे यम, यमदूत और देखनेमें अतिशय भयंकर लगनेवाले नरकलोकोंको न देखना पड़े, ऐसा कोई उपाय बतानेकी कृपा करें।
वसिष्ठने कहा— हे राजन्! शास्त्रवेत्ता अनेक प्रकारके धर्मोंका वर्णन करते हैं, किंतु कर्ममार्गसे विमोहित जन सूक्ष्मतया उनको नहीं जानते। दान, तीर्थ, तपस्या, यज्ञ, संन्यास तथा पितृक्रिया आदि सभी धर्म हैं, उन धर्मोंमें भी वृषोत्सर्गका विशेष महत्त्व है। मनुष्यको बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये। यदि उनमेंसे एक भी पुत्र गया-तीर्थमें जाय, अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नील वृषभ यथाविधि छोड़े तो जाने-अनजाने किये गये ब्रह्महत्या आदि पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। यह शुद्धि नील वर्णके वृषभका उत्सर्ग अथवा समुद्रमें स्नान करनेसे भी हो सकती है। हे राजेन्द्र! जिसके एकादशाहमें वृषोत्सर्ग नहीं होता, उसका प्रेतत्व स्थिर ही रहता है। मात्र श्राद्ध करनेसे क्या लाभ होगा ? जिस-किसी भाँति नगर अथवा तीर्थमें वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये।
हे खगेश! वृष-यज्ञके द्वारा प्रेतत्वसे मुक्ति प्राप्त होती है, अन्य साधनोंसे नहीं। जो वृषभ शुभ लक्षणोंसे समन्वित युवा तथा कृष्ण गल-कम्बलवाला हो और सदैव जो गायोंके झुंडमें घूमनेवाला हो, उस वृषभको विधि-विधानसे चार अथवा दो या एक बछियाके साथ पहले उसका विवाह करना चाहिये। तदनन्तर माङ्गलिक द्रव्यों एवं मन्त्रोंके साथ उन सबका उत्सर्ग किया जाय। 'इहरतीति०* इन छः मन्त्रोंसे अग्निदेवको आहुति देनी चाहिये। कार्तिक, माघ और वैशाखकी पूर्णिमा, संक्रान्ति, अन्य पुण्यकाल, व्यतिपात तथा तीर्थमें और पिताकी क्षयतिथि वृषोत्सर्गके लिये विशेष रूपसे प्रशस्त मानी जाती है। 'जो वृषभ लाल वर्णका हो और उसका मुँह-पूँछ पाण्डु (श्वेत-पीतमिश्रित) हो, खुर और सींगोंका वर्ण पीत हो, वह नीलवृषभ कहा जाता है'—
लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पाण्डुरः॥
<p align="right">(६। १९-२०)</p>
पीतः खुरविषाणेषु स नीलो वृष उच्यते।
जो वृषभ श्वेत वर्णका होता है वह ब्राह्मण है, जो लोहित वर्णका है वह क्षत्रिय है, जो पीत वर्णका है वह वैश्य है और जो कृष्ण वर्णका है वह शूद्र है। अतः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्णको अपने वर्णके अनुसार वृषोत्सर्ग करना चाहिये अथवा रक्तवर्णका ही वृषभ सबके लिये कल्याणप्रद है।
पिता, पितामह तथा प्रपितामह पुत्रके उत्पन्न होनेपर यही आशा करते हैं कि यह मेरे लिये वृषोत्सर्ग करेगा। वृषोत्सर्गके समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—
धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्ददायकः॥
<p align="right">(६। २३—२५)</p>
अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।
गङ्गायमुनयोः पेयमन्तर्वेदि तृणं चर॥
धर्मराजस्य पुरतो वाच्यं मे सुकृतं वृष।
हे धर्म! आप इस वृषभरूपमें संसारको आनन्द प्रदान करनेवाले देव हैं। आप ही अष्टमूर्ति शिवके अधिष्ठान हैं। अतः मुझे शान्ति प्रदान करें। आप गङ्गा-यमुनाका जल पियें। अन्तर्वेदीमें घास चरें और हे वृष! धर्मराजके सामने मेरे पुण्यकर्मकी चर्चा करें।
इस प्रकारका निवेदन करते हुए संस्कार्ताको चाहिये कि वृषभके दाहिने कन्धेपर त्रिशूल और
* ॐ इह रतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह रमध्वं स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह धृतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ इह स्वधृतिः स्वाहा इदमग्नये। ॐ उपसृजन् धरुणं मात्रे धरुणो मातरं धयन् स्वाहा इदमग्नये। ॐ रायस्पोषमस्मासु दीधरत् स्वाहा इदमग्नये। (यजु० ८। ५१)