गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 498, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
|---|
करता है। इस संसारमें अनेक प्रकारके देवता, पक्षी तथा मनुष्यादिकी योनियाँ हैं, जो कर्मपाशमें बँधी हुई हैं। वे सदैव पृथक्-पृथक् रूपसे कर्मफलोंका भोग करते हुए सत्त्वगुणसे देवत्व, रजोगुणसे मनुष्यत्व और तमोगुणसे तिर्यक् योनि प्राप्त करते हैं। वासनामें आबद्ध बुद्धिहीन प्राणी माताके गर्भसे बार-बार जन्म लेकर मृत्युका वरण करता है। इस प्रकार उन असंख्य योनियोंमें जाकर वह कभी दैवयोगसे ही मनुष्यकी दुर्लभ योनिको प्राप्त कर, महात्माओंकी कृपासे भगवान् हरिको जानकर तथा अपार भवसागरको रोगरूपी ग्राह और मोहरूपी पाशसे युक्त समझकर मुक्त हो जाता है। इस भवसागरको पार करनेके इच्छुक प्राणीके लिये राम-नाम-स्मरणके अतिरिक्त अन्य कोई साधन हमें दिखायी नहीं देता है। जैसे दहीका मन्थन करनेसे नवनीत और काष्ठका मन्थन करनेसे अग्नि प्राप्त होती है, वैसे ही आत्ममन्थन कर उस परमात्माको जो प्राणी जान लेता है, वह सुखी हो जाता है।
यह आत्मा नित्य, अव्यय, सत्य, सर्वगामी, सभी प्राणियोंमें अवस्थित और महान् है। यह अप्रमेय है। यह स्वयंमें ज्योतिस्वरूप एवं मनसे भी अग्राह्य है। यह वह तत्त्व है, जो सच्चिदानन्दरूप है और सभी प्राणियोंके हृदयमें विराजमान रहता है। भावोंके विनष्ट हो जानेपर भी कभी विनष्ट नहीं होता है। जिस प्रकार आकाश सभी प्राणियोंमें, तेज जलमें तथा वायु सभी पार्थिव पदार्थोंमें स्थित है, उसी प्रकार आत्मा सर्वत्र व्याप्त और निर्लेप है। भक्तोंपर कृपादृष्टि रखनेवाले भगवान् हरि साधुओंकी रक्षा करनेके लिये अवतरित होते हैं। यद्यपि वे निर्गुण हैं, फिर भी अज्ञानियोंको गुणवान् प्रतीत होते हैं। जो व्यक्ति इस प्रकारकी ज्ञानवती बुद्धिसे अपने हृदयमें उस परमात्माका चिन्तन करता है, उसके भक्तियोगसे संतुष्ट होकर वे अजन्मा पुरुष परमात्मा उसको अपना दर्शन देते हैं। तत्पश्चात् वह भक्त कृतार्थ हो जाता है और सर्वदा सर्वत्र निष्कामभावसे बना रहता है। अतः बन्धनयुक्त इस शरीरमें अहंकारका परित्याग करके स्वप्नप्राय संसारमें ममता और आसक्तिसे रहित होकर संचरण करे। स्वप्नमें धैर्य कहाँ स्थिर रहता है? इन्द्रजालमें कहाँ सत्यता होती है? शरत्कालके मेघमें कहाँ नित्यता रहती है? वैसे ही शरीरमें सत्यता कहाँ रहती है? यह दृश्यमान समस्त चराचर जगत् अविद्या-कर्मजनित है। ऐसा जानकर तुम्हें आचारवान् योगी बनना चाहिये। उससे तुम सिद्धि प्राप्त कर सकते हो।
इस प्रकारका उपदेश देकर वे सभी दीन-हीन प्राणियोंपर वात्सल्य-भाव रखनेवाले साधु वहाँसे चले गये। तदनन्तर मैं (नारद) उनके द्वारा बताये गये मार्गसे उसी प्रकारका आचरण प्रतिदिन करता रहा। कुछ ही समयके पश्चात् मैंने अपने अन्तःकरणमें यह एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा कि शरत्कालीन चन्द्रमाके समान निर्मल, प्रतिक्षण आनन्द प्रदान करनेवाला अद्भुत प्रकाशपुञ्ज प्रज्वलित हो रहा है। वह महातेज मुझे प्रचुर सुखसे सींचकर (अपने प्रति) अधिक स्पृहायुक्त बनाकर आकाशमें विद्युत्की भाँति अन्तर्हित हो गया। भक्तिपूर्वक मैं उस अनोखे ज्योतिपुञ्जका ध्यान करता हुआ समय आनेपर अपना शरीर छोड़कर विष्णुलोक चला गया।
हे ब्रह्मन्! उन्हीं प्रभुकी इच्छासे पुनः मेरा जन्म ब्रह्मासे हुआ। उन भगवान्की कृपासे ही मैं आज अनासक्त रहकर तीनों लोकोंमें बार-बार वीणा बजाते और गीत गाते हुए घूमता रहता हूँ।
अपना ऐसा अनुभव बताकर मुनि नारद मेरे पाससे मनोनुकूल दिशामें चले गये। उनकी उस बातसे मुझको बड़ा ही आश्चर्य हुआ और बहुत संतोष भी मिला।