गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-
सुदर्शनचक्रधारी मुझ हरिको प्रणाम कर वह इस प्रकार स्तुति करने लगा—
जिन भगवान्ने अपने चक्रके प्रहारसे ग्राहके मुखको विदीर्णकर उसके दुःखको नष्ट किया था, जो ग्राहके मुखमें फँसे हुए गजराजको मुक्त करानेवाले हैं, वे श्रीहरि मेरे कर्मपाशको काटकर मुझे मुक्त करें। मगधनरेश जरासन्धने निर्दोष राजाओंको बंदी बनाकर कारागारमें डाल दिया था, जिन मुरारि श्रीकृष्णने राजसूययज्ञके लिये पाण्डुपुत्र भीमसेनके द्वारा उस दुष्टको मल्लयुद्धमें मरवाकर राजाओंको मुक्त किया था। वे इस समय मेरे कर्मपाशको काटकर मेरा दुःख दूर करें।
हे गरुड! उस समय दत्तचित्त होकर जब वह मेरी स्तुतिमें लग गया तो उसे सुनते ही मैं भी उठ खड़ा हुआ और सहसा वहाँ जा पहुँचा, जहाँ प्रेत उसको लेकर जा रहे थे। उन लोगोंके द्वारा ले जाते हुए उस ब्राह्मणको देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। कुछ कालतक बिना पूछे मैं भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा। मेरी संनिधिमात्रसे उस ब्राह्मणको पालकीमें सोये हुए राजाके समान सुख प्राप्त हुआ। इसके बाद मैंने मार्गमें सुमेरु पर्वतपर जा रहे मणिभद्र नामक यक्षराजको देखा। मैंने नेत्रोंके संकेतसे उन्हें अपने पास बुलाया और कहा—हे यक्षराज! तुम इस समय इन प्रेतोंको विनष्ट करनेके लिये प्रतिद्वन्द्वी योद्धा बन जाओ। युद्धमें इन्हें मारकर इस शवको अपने अधिकारमें करो।
ऐसा सुनते ही उस मणिभद्रने प्रेतोंको दुःख पहुँचानेवाले प्रेतरूपको धारण कर लिया। दोनों भुजाओंको फैलाकर ओठोंको जीभसे चाटते हुए और अपनी लम्बी-लम्बी निःश्वासोंसे उन प्रेतोंको दहलाते हुए वह मणिभद्र उनके सम्मुख जाकर डट गया। उसने दोको अपनी दोनों भुजाओंसे, दोको दोनों पैरोंसे और एकको सिरसे पकड़ लिया। उसके बाद अपने शक्तिशाली मुक्केसे उन प्रेतोंपर ऐसा प्रहार किया कि वे सभी विवर्णमुख हो गये। वे उस ब्राह्मण तथा शवको एक हाथ और एक पैरसे पकड़कर युद्ध करने लगे। उन लोगोंने अपने नख-थप्पड़, लात एवं दाँतोंसे उसपर प्रहार किये, पर मणिभद्रने उनके प्रहारको विफल कर उनसे शवको ले लिया। उस यक्षके द्वारा शवको छीन लिये जानेपर पारियात्र पर्वतपर उस ब्राह्मणको छोड़कर वे सभी प्रेत अत्यन्त उत्साहसे भरे हुए पुनः प्रेतरूप मणिभद्रकी ओर दौड़ पड़े। क्षणमात्रमें ही उन लोगोंने वायुके समान द्रुतगामी मणिभद्रको घेर लिया, किंतु वह अदृश्य हो गया। ऐसी स्थिति देखकर हताश होकर वे प्रेत उस ब्राह्मणके पास जा पहुँचे। उस पर्वतपर पहुँचकर उन लोगोंने ब्राह्मणको ज्यों ही मारना प्रारम्भ किया, त्यों ही मेरी उपस्थिति और ब्राह्मणके प्रभावसे तत्काल उनमें पूर्वजन्मकी स्मृति जाग्रत् हो उठी। इसके बाद ब्राह्मणकी प्रदक्षिणा करके उन प्रेतोंने ब्राह्मणश्रेष्ठसे कहा—हे विप्रदेव! आप हमें क्षमा करें। उनके दीन वचनोंको सुनकर ब्राह्मणने पूछा—आप लोग कौन हैं? यह क्या कोई माया है अथवा यह मैं स्वप्न देख रहा हूँ या यह मेरे चित्तका विभ्रम है?
प्रेतोंने कहा—हम सब प्रेत हैं और पूर्वजन्मके