भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 504
४९४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

देशसे अपने घर लौट आया। घरमें वह सब सामान रखकर मैंने उस मित्रकी पत्नीके पास जाकर कहा कि मार्गमें डाकुओंने मेरे उस मित्रको मारकर सब सामान छीन लिया और मैं भाग आया हूँ। मैंने उससे फिर कहा कि हे पुत्रवती नारी ! तुम रोना नहीं। शोकसे व्यथित उस स्त्रीने तत्काल घरके बन्धु-बान्धवोंकी ममताका परित्याग कर अपने प्राणोंकी भेंट अग्निको यथाविधि चढ़ा दिया। उसके बाद निष्कण्टक स्थिति देखकर मैं प्रसन्नचित्त अपने घर चला आया। घर आकर जबतक मेरा जीवन रहा, तबतक उस धनका मैंने उपभोग किया। मित्रको नदीके जल-प्रवाहमें फेंककर मैं शीघ्र ही अपने घर लौट आया था, उसी पापके कारण मुझे प्रेतयोनि मिली और मेरा नाम शीघ्रग हो गया।

**रोधकने कहा—**हे मुनीश्वर ! मैं पूर्व-जन्ममें शूद्र जातिका था। राजभवनसे मुझे जीवन-यापनके लिये उपहारमें बहुत बड़े-बड़े सौ गाँवोंका अधिकार प्राप्त था। मेरे परिवारमें बूढ़े माता-पिता थे और एक छोटा सगा भाई था। लोभवश मैंने शीघ्र ही अपने उस भाईको अलग कर दिया जिसके कारण अन्न-वस्त्रसे रहित उस भाईको अत्यधिक दुःख भोगना पड़ा। उसके दुःखको देखकर मेरे माता-पिता लुक-छिपकर कुछ-न-कुछ उसको दे देते थे। जब मैंने भाईको माता-पिताके द्वारा दी जा रही उस सहायताकी बात विश्वस्त पुरुषोंसे सुनी तो एक सूने घरमें माता-पिताको जंजीरसे रुद्ध कर दिया। कुछ दिनोंके बाद दुःखी उन दोनोंने विष पीकर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ली। हे द्विज ! माता-पितासे रहित होकर मेरा भाई भी इधर-उधर भटकने लगा। ग्राम तथा नगरमें भटकता हुआ एक दिन वह भी भूखसे पीड़ित होकर मर गया। हे ब्राह्मण ! मरनेके बाद उसी पापके कारण मुझे यह प्रेतयोनि मिली। माता-पिताको मैंने बंदी बनाया था, इसी कारण मेरा नाम रोधक पड़ा।

**लेखकने कहा—**हे विप्रदेव ! मैं पूर्वजन्ममें उज्जैन नगरका ब्राह्मण था। वहाँके राजाने मेरी नियुक्ति देवालयमें पुजारीके पदपर की थी। उस मन्दिरमें विभिन्न नामवाली बहुत-सी मूर्तियाँ थीं। स्वर्णनिर्मित उन प्रतिमाओंके अङ्गोंमें बहुत-सा रत्न भी लगा हुआ था। उनकी पूजा करते हुए मेरी बुद्धि पापासक्त हो गयी। अतः मैंने एक तेज धारवाले लोहेसे उन मूर्तियोंके नेत्रादिसे रत्नोंको निकाल लिया। क्षत-विक्षत और रत्नरहित नेत्रोंको देखकर राजा प्रज्वलित अग्निके समान क्रोधसे तमतमा उठा। उसके बाद राजाने यह प्रतिज्ञा की कि चोर चाहे श्रेष्ठ ब्राह्मण ही क्यों न हो यदि उसने मूर्तियोंसे रत्न और सोना चुराया होगा तो ज्ञात होनेपर निश्चित ही मेरे द्वारा मारा जायगा। वह सब सुनकर मैंने रात्रिमें तलवार उठायी और राजाके घरमें जाकर उसका पशुकी तरह वध कर दिया। तदनन्तर चुरायी गयी मणियों तथा सोनेको लेकर मैं रात्रिमें ही अन्यत्र जाने लगा, किंतु मार्गमें स्थित घनघोर जंगलमें एक व्याघ्रने मुझे मार डाला। मैंने लोहेसे प्रतिमा-छेदन एवं काटनेका जो कार्य किया था, उस पापसे आज मैं लेखक नामका प्रेत हूँ। नरकभोग करनेके पश्चात् मुझे यही प्रेत-योनि प्राप्त हुई।

**ब्राह्मणने कहा—**हे प्रेतगणो ! आप लोगोंने अपनी जैसी दशाएँ बतायी हैं, वैसे ही आप सबके नाम भी हैं। वर्तमान समयमें तुम लोगोंका आचरण और आहार क्या है ? उसको भी मुझे बताओ।

**प्रेतोंने कहा—**हे द्विजराज ! जहाँपर वेदमार्गका अनुसरण होता है, जहाँ लज्जा,धर्म, दम, क्षमा, धृति और ज्ञान—ये सब रहते हैं, वहाँ हम सब वास नहीं करते। जिसके घरमें श्राद्ध तथा तर्पणका