गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४९६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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उठता है। जो लोग अपने सगे-सम्बन्धियोंके द्वारा किये गये श्राद्धसे संतृप्त हो जाते हैं, वे श्राद्धकर्ताको पुत्र, स्त्री और धन आदिके द्वारा तृप्त करते हैं। हे गरुड! इस प्रकार मैंने संक्षेपमें अधिकार और क्रिया-भेदका निरूपण किया।
गरुडने कहा— हे देवश्रेष्ठ! यदि पहले कहे गये अधिकारियोंमेंसे एक भी न हो तो उस समय मनुष्यको क्या करना चाहिये?
श्रीकृष्णने कहा— जब अधिकारी व्यक्ति न हो और न तो किसीके अधिकारका निश्चय ही हो रहा हो तो वैसी स्थितिमें मनुष्यको स्वयं अपने जीवनकालमें ही जीवित-श्राद्ध कर लेना चाहिये। उपवासपूर्वक स्नान करके भगवान् कृष्णके प्रति आसक्त-हृदय होकर मनुष्य एकाग्र मनसे उस कर्ता, भोक्ता, सर्वेश्वर विष्णुकी पूजा करे। उसके बाद वह अपने पितृगणोंके लिये तिल एवं दक्षिणाके सहित तीन जलधेनु* 'ॐ पितृभ्यः स्वधा' कहकर निवेदित करे और धेनुदान करते समय 'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नमः' तथा 'ॐ सोमाय त्वा पितृमते स्वधा नमः' ऐसा स्मरण करता हुआ वह दक्षिणाभिमुख होकर दक्षिणासहित तीसरी जलधेनु देते समय विशेषरूपसे 'यमायाङ्गिरसे स्वधा नमः' यह स्मरण करता रहे। भगवान् विष्णुके यजन एवं जलधेनुदानके मध्य ही ब्राह्मणोंका आवाहन करके उन्हें भोजन कराना चाहिये। वह पहली जलधेनु उत्तर दिशामें तथा दूसरी जलधेनु दक्षिण दिशामें रखे और उन दोनों धेनुओंके मध्यमें तीसरी धेनु रखकर आवाहन आदि श्राद्धसम्बन्धी कार्य करे। इस आवाहनादि क्रियाके पूर्वमें सर्वप्रथम आवाहनपूर्वक विश्वेदेवोंके प्रतिनिधिभूत ब्राह्मणोंकी भलीभाँति पूजा कर वह यह कहे—
वसुभ्यस्त्वामहं विप्र रुद्रेभ्यस्त्वामहं ततः।
सूर्येभ्यस्त्वामहं विप्र भोजयामीति तान्वदेत्॥
(८। १७)
तदनन्तर आवाहनादिक जो शेष कार्य हैं, उन्हें पितृ-शेष कार्योंकी तरह सम्पादित करे। उसके बाद वह वसुके उद्देश्यसे ब्राह्मणको एक सुशील धेनुका दान दे। तत्पश्चात् आग्नेय कोणमें रुद्रदेव तथा दक्षिण दिशामें सूर्यदेवके निमित्त स्थित ब्राह्मणोंको भी एक-एक गाय देनी चाहिये तथा विश्वेदेवोंके लिये तिलपूर्ण पात्रका निवेदन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको अक्षय्योदक दान करना चाहिये एवं ब्राह्मण 'ॐ स्वस्ति' इस प्रतिवचनसे श्राद्धकृत्यकी सम्पूर्णताका आशीर्वाद दें। इसके बाद अष्टाक्षर-मन्त्रसे भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए उनका विसर्जन करे।
इसके पश्चात् स्वस्थचित्त होकर कुलदेवी, ईशानी, शिव तथा भगवान् नारायणका स्मरण करे। तदनन्तर चतुर्दशी तिथिको सुगमतासे उपलब्ध होनेवाली श्रेष्ठ नदीके तटपर जाय। वहाँ वस्त्र तथा लौहखण्डोंका दान करे एवं 'ॐ जितं ते' इस मन्त्रका जप करता हुआ स्वयं दक्षिणाभिमुख होकर अग्निको प्रज्वलित करे। तदनन्तर वह पचास कुशोंसे ब्राह्मीप्रतिकृति (पुत्तल) बना करके उसका दाह करे। इसके बाद श्मशानमें विहित होम करके अन्तमें पूर्णाहृतिकी क्रिया सम्पन्न करे। तत्पश्चात् निरग्नि भूमि, यम तथा रुद्रदेवका स्मरण करे। हवन करनेके बाद प्रधान स्थानपर उक्त देवोंका आवाहन करना चाहिये। उसके बाद वह अग्निमें मूँगमिश्रित चरु पकाये। तदनन्तर तिल-तण्डुल-मिश्रित दूसरा चरु पकाये।
'ॐ पृथिव्यै नमस्तुभ्यं०'—इस मन्त्रसे प्रथम चरु निवेदित करे। 'ॐ यमाय नमश्च०' इस
* दानके लिये कृत्रिम धेनुका विधान है। इसे गोदानप्रसंगमें वराहपुराण आदिमें जलधेनुदानविधिके अन्तर्गत देखना चाहिये।