भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 518, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 518
५०८संक्षिप्त गरुडपुराण[धर्मकाण्ड-

मारा जायगा? मनुष्य बाल्यावस्थामें अपने पिता-माताके अधीन होता है। युवावस्था आनेपर वह स्त्रीका हो जाता है और अन्त समय आनेपर पुत्र-पौत्रके व्यामोहमें फँस जाता है। वह मूर्ख कभी किसी अवस्थामें आत्माके अधीन नहीं रहता। लौह और काष्ठके बने हुए पाशसे बँधा हुआ व्यक्ति मुक्त हो जाता है, किंतु पुत्र तथा स्त्री आदिके मोहपाशमें बँधा हुआ प्राणी कभी मुक्त नहीं हो पाता।

पाप एक मनुष्य करता है, किंतु उसके फलका उपभोग बहुत-से लोग करते हैं। भोक्ता तो अलग हो जाते हैं पर कर्ता दोषका भागी होता है। चाहे बालक हो, चाहे वृद्ध हो और चाहे युवा हो, कोई भी मृत्युपर विजय नहीं प्राप्त कर सकता। कोई अधिक सुखी हो अथवा अधिक दुःखी हो, वह बारम्बार आता-जाता है। मृत प्राणी सबके देखते-देखते सब कुछ छोड़कर चला जाता है। इस मर्त्यलोकमें प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है और अकेले ही पाप-पुण्यका भोग करता है। 'बन्धु-बान्धव मरे हुए स्वजनके शरीरको पृथ्वीपर लकड़ी और मिट्टीके ढेलेकी भाँति फेंककर पराङ्मुख हो जाते हैं; धर्म ही उसका अनुसरण करता है। प्राणीका धन-वैभव घरमें ही छूट जाता है। मित्र एवं बन्धु-बान्धव श्मशानमें छूट जाते हैं। शरीरको अग्नि ले लेती है। पाप-पुण्य ही उस जीवात्माके साथ जाते हैं।'

मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं क्षितौ॥
बान्धवा विमुखा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति।
गृहेष्वर्था निवर्तन्ते श्मशानान्मित्रबान्धवाः॥
शरीरं वह्निरादत्ते सुकृतं दुष्कृतं व्रजेत्।
शरीरं वह्निना दग्धं पुण्यं पापं सह स्थितम्॥
(१२। २४-२६)

'मनुष्यने जो भी शुभ या पाप-कर्म किया है, वह सर्वत्र उसीको भोगता है। हे पक्षिराज! सूर्यास्ततक जिसने याचकोंको अपना धन नहीं दे दिया तो न जाने प्रातः होनेपर उसका वह धन किसका हो जायगा? पूर्वजन्मके पुण्यसे जो थोड़ा या बहुत धन प्राप्त हुआ है, उसे यदि परोपकारके कार्यमें नहीं लगाया या श्रेष्ठ द्विजॉँको दानमें नहीं दिया तो उसका वह धन यह रटता रहता है कि कौन मेरा भर्ता होगा? ऐसा विचार कर धर्मके कार्यमें अपना धन लगाना चाहिये। मनुष्य श्रद्धापूत शुद्ध मनसे दिये गये धनके द्वारा धर्मको धारण करता है। श्रद्धारहित धर्म इस लोक तथा परलोकमें फलीभूत नहीं होता। धर्मसे ही अर्थ और कामकी भी प्राप्ति होती है। धर्म ही मोक्षका प्रदायक है। अतः मनुष्यको धर्मका सम्यक् आचरण करना चाहिये। धर्मकी सिद्धि श्रद्धासे होती है, प्रचुर धनराशिसे नहीं। अकिञ्चन अर्थात् धन-वैभवसे रहित श्रद्धावान् मुनियोंको स्वर्गकी प्राप्ति हुई है। श्रद्धारहित होकर किया गया होम, दान तथा तप असत् कहा जाता है। हे पक्षिन्! उसका फल न तो इस लोकमें मिलता है और न परलोकमें ही मिलता है'—

शुभं वा यदि वा पापं भुङ्क्ते सर्वत्र मानवः।
यदनस्तमिते सूर्ये न दत्तं धनमर्थिनाम्॥
न जाने तस्य तद्वित्तं प्रातः कस्य भविष्यति।
रारटीति धनं तस्य को मे भर्ता भविष्यति॥
न दत्तं द्विजमुख्येभ्यः परोपकृतये तथा।
पूर्वजन्मकृतात् पुण्याद्यल्लब्धं बहु चाल्पकम्॥
तदीदृशं परिज्ञाय धर्मार्थे दीयते धनम्।
धनेन धार्यते धर्मः श्रद्धापूतेन चेतसा॥
श्रद्धाविरहितो धर्मो नेहामुत्र च तत्फलम्।
धर्माच्च जायते ह्यर्थो धर्मात् कामोऽपि जायते॥
धर्म एवापवर्गाय तस्माद्धर्मं समाचरेत्।
श्रद्धया साध्यते धर्मो बहुभिर्नार्थराशिभिः॥
अकिञ्चना हि मुनयः श्रद्धावन्तो दिवं गताः।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पक्षिन् प्रेत्य चेह न तत्फलम्॥
(१२। २७-३३)

(अध्याय १२)