गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५३० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड- |
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अनुरक्त रहते हैं, वे मृत्युके पश्चात् प्रेतयोनिमें जन्म लेते हैं। जो मनुष्य बावली, कूप, जलाशय, उद्यान, देवालय, प्याऊ, घर, आम्रादिक फलदार वृक्ष, रसोईघर, पितृ-पितामहके धर्मको बेच देता है, वह पापका भागी होता है। ऐसा व्यक्ति मरनेके बाद प्रलयकालतक प्रेतयोनिमें रहता है। जो लोग लोभवश गोचारणकी भूमि, ग्रामकी सीमा, जलाशय, उपवन और गुफाभागको जोत लेते हैं, वे प्रेत होते हैं।<sup>१</sup> पापियोंकी मृत्यु चण्डाल, जल, सर्पदंश, ब्राह्मण-शाप, विद्युत्-निपात, अग्नि, दन्त-प्रहार तथा पशुके आक्रमणसे होती है। जो लोग फाँसी लगानेसे, विषद्वारा और शस्त्रसे मरते हैं, जो आत्मघाती हैं, जिनकी विषूचिका (हैजा) आदि रोगोंसे मृत्यु होती है, जो क्षयादिक महारोग, पापजन्य रोग और चोर-डकैतोंके द्वारा मारे जाते हैं, जिनका मरनेपर संस्कार नहीं हुआ है, विहित आचारसे रहित, वृषोत्सर्गादिसे रहित और मासिक पिण्डदान जिनका लुप्त हो गया है, जिस मरे हुए प्राणीके लिये तृण, काष्ठ, हविष्य तथा अग्नि शूद्र लाता है, पर्वतों अथवा दीवालके ढहनेसे जिनकी मृत्यु हो जाती है, निन्दित दोषोंसे जिनकी मृत्यु होती है, जिनकी मृत्यु भूमिमें नहीं होती, जिनकी मृत्यु अन्तरिक्षमें होती है, जो भगवान् विष्णुका स्मरण न करते हुए मर जाते हैं, जिनकी मृत्यु सूतक और श्वानादि निकृष्ट योनियोंके संसर्गमें होती है, वे प्रेतयोनिमें जाते हैं।<sup>२</sup> इसी प्रकारके अन्य कारणोंसे जो प्राणी दुर्मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनको प्रेतयोनिमें मरुस्थल प्रदेशमें भटकना पड़ता है।
हे तार्क्ष्य ! जो व्यक्ति निर्दोष माता, बहन, पत्नी, पुत्रवधू तथा कन्याका परित्याग करता है, वह निश्चित ही प्रेत होता है। जो भ्रातृद्रोही, ब्रह्मघाती, गोहन्ता, मद्यपी, गुरुपत्नीके साथ सहवास करनेवाला, स्वर्ण और रेशमका चोर है, वह प्रेतत्वको प्राप्त होता है। घरमें रखी हुई धरोहरका अपहारक, मित्रद्रोही, परस्त्रीरत, विश्वासघाती एवं क्रूर व्यक्ति अवश्य प्रेतयोनिमें जन्म लेता है। जो वंशपरम्परागत धर्मपथका परित्याग करके दूसरे धर्मको स्वीकार करनेवाला है, विद्या और सदाचारसे जो विहीन है, वह भी निस्संदेह प्रेत ही होता है।<sup>३</sup>
हे सुव्रत ! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास है, जो पितामह भीष्म और युधिष्ठिरके संवादमें कहा गया था। मैं उसीको कहता हूँ, उसे सुन करके मनुष्य सुख प्राप्त करता है।
युधिष्ठिरने कहा—हे पितामह ! प्राणी किस कर्मफलसे प्रेत होता है ? उसकी कैसे और किस उपायसे मुक्ति होती है ? इस बातको आप मुझे बतानेकी कृपा करें, जिसको सुन करके मैं पुनः
१-पापकर्मरता ये वै पूर्वकर्मवशानुगाः। जायन्ते ते मृताः प्रेतास्ताञ्छृणुष्व वदाम्यहम् ॥
वापीकूपतडागांश्च आरामं सुरमन्दिरम् । प्रपां सद्म सुवृक्षांश्च तथा भोजनशालिकाः ॥
पितृपैतामहं धर्मं विक्रीणाति स पापभाक् । मृतः प्रेत्वमाप्नोति यावदाभूतसम्प्लवम् ॥
गोचरं ग्रामसीमां च तडागारामगह्वरम् । कर्षयन्ति च ये लोभात् प्रेतास्ते वै भवन्ति हि ॥ (२२। ३—६)
२- असंस्कृतप्रमीता ये विहिताचारवर्जिताः ॥
वृषोत्सर्गादिलुप्ताश्च लुप्तमासि कपिण्डकाः । यस्यानयति शूद्रोऽग्निं तृणकाष्ठहवींषि सः ॥
पतनात् पर्वतानां च भित्तिपातेन ये मृताः। रजस्वलादिदोषैश्च न च भूमौ मृताश्च ये ॥
अन्तरिक्षे मृता ये च विष्णुस्मरणवर्जिताः। सूतकैः श्वादिसम्पर्कैः प्रेतभावा इह क्षितौ ॥ (२२। ९—१२)
३-मातरं भगिनीं भार्यां स्नुषां दुहितरं तथा। अदुष्टदोषां त्यजति स प्रेतो जायते ध्रुवम् ॥
भ्रातृध्रुग्ब्रह्महा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः । हेमक्षौमहरस्तार्क्ष्य स वै प्रेतत्वमाप्नुयात् ॥
न्यासापहर्ता मित्रध्रुक् परदाररतस्तथा। विश्वासघाती क्रूरस्तु स प्रेतो जायते ध्रुवम् ॥
कुलमार्गांश्च संत्यज्य परधर्मरतस्तथा। विद्यावृत्तविहीनश्च स प्रेतो जायते ध्रुवम् ॥ (२२ । १४—१७)