गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि ४५
'ॐ हां सदाशिवाय नमः' ऐसा कहकर साधक तर्जनी अंगुलिके द्वारा अनार-पुष्पके सदृश कान्तिमान् एक पिण्डका निर्माण करे। उस पिण्डके प्रदर्शनमात्रसे ही दुष्ट जन, मेघ, विद्युत्, विष, राक्षस, भूत और डाकिनी आदि दसों दिशाओंको छोड़कर भाग जाते हैं।
'ॐ ह्रीं गणेशाय नमः।' 'ॐ ह्रीं स्तम्भनादिचक्राय नमः।' 'ॐ ऐं ब्राह्म्यै त्रैलोक्यडामराय नमः।'- इस मन्त्र-संग्रहको भैरव-पिण्ड कहा जाता है। यह भैरव-पिण्ड विष तथा पापग्रहोंके कुप्रभावको समाप्त करनेमें समर्थ है। यह साधकके कार्यक्षेत्रकी रक्षा और भूत-राक्षसादिकी उपद्रवी शक्तियोंको नष्ट करता है।
'ॐ नमः' यह कहकर साधक अपने हाथमें इन्द्रवज्रका ध्यान करे। इस वज्रमुद्रासे विष, शत्रु और भूतगण विनष्ट हो जाते हैं। 'ॐ क्षुं (क्ष) नमः' इस मन्त्रसे बायें हाथमें पाशका स्मरण करे, जिससे विष तथा भूतादिका विनाश होता है। इसी प्रकार 'ॐ हां (हो) नमः' इस मन्त्रके उच्चारणसे उपद्रवकारी मेघ और पापग्रहोंके प्रभाव नष्ट हो जाते हैं। कृतान्त-यमराजका ध्यान करके साधक छेदक अस्त्र (भाले)-से शत्रु-समूहका विनाश करे। 'ॐ क्ष्ण (क्ष्म) नमः' इस मन्त्रोच्चारके साथ कालभैरवका ध्यान करके मनुष्य पापग्रह, भूत, विषके प्रभावका शमन कर सकता है।
'ॐ लसद्दंष्ट्रिजिव्हाक्ष स्वाहा' इस मन्त्रका ध्यान करके मनुष्य खेती-वाड़ीमें विघ्न डालनेवाले ग्रह, भूत, विष और पक्षियोंका निवारण कर सकता है। 'ॐ क्ष्व (क्ष्णं) नमः' इस मन्त्रको रक्त-वर्णकी स्याहीसे नगाड़ेपर लिखकर उसे बजाना चाहिये। उसके शब्दोंको सुनकर पापग्रह आदि सभी उपद्रवकारी तत्त्व भयभीत हो उठते हैं।
(अध्याय १९-२०)
पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि
सूतजीने कहा-हे ऋषियो! अब मैं पञ्चमुख शिवकी पूजाका वर्णन करूँगा, जो साधकको भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती है। साधकको सबसे पहले निम्न मन्त्रसे उन देवका आवाहन करना चाहिये-
'ॐ भूर्विष्णवे आदिभूताय सर्वाधाराय मूर्तये स्वाहा।'
पुनः 'ॐ हां सद्योजाताय नमः।' कहकर साधक सद्योजातका आवाहन करे। इन सद्योजातकी आठ कलाएँ कही गयी हैं। उनका नाम सिद्धि, ऋद्धि, धृति, लक्ष्मी, मेधा, कान्ति, स्वधा और स्थिति है। सद्योजातकी पूजा करनेके पश्चात् 'ॐ सिद्धयै नमः' इत्यादि मन्त्रोंसे उन सभी आठ कलाओंकी पूजा करनेका विधान है। तदनन्तर 'ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः' इस मन्त्रसे साधक वामदेवकी पूजा करे। वामदेवकी तेरह कलाएँ हैं, जिन्हें रजा, रक्षा, रति, पाल्या, कान्ति, तृष्णा, मति, क्रिया, कामा, बुद्धि, रात्रि, त्रासनी तथा मोहिनी कला कहा गया है। इन कलाओंके अतिरिक्त मनोन्मनी, अघोरा, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया तथा भयंकरा नामकी आठ कलाएँ (अघोरकी) हैं।
उक्त समस्त कलाओंका पूजन करनेके बाद साधकको 'ॐ हैं तत्पुरुषाय नमः' इस मन्त्रसे तत्पुरुषदेवकी पूजा करनी चाहिये। उनकी निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति और सम्पूर्णा-ये पाँच कलाएँ हैं। साधक कलाओंकी पूजा करके 'ॐ ह्रौं ईशानाय नमः' इस मन्त्रसे ईशानदेवकी पूजा करे। तत्पश्चात् ईशानदेवकी निश्चला, निरञ्जना, शशिनी, अंगना, मरीचि और ज्वालिनी नामकी जो छः कलाएँ हैं, उनकी पूजा करके पूजन पूर्ण करे।