गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेतकल्प ] सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व ५४३
श्राद्ध करता है। विकिरान्नदान एक और पिण्डदान पृथक्-पृथक् करने चाहिये। इसी विधिका पालन तीर्थ, पितृपक्ष अथवा चन्द्र और सूर्य-ग्रहणके अवसरमें भी होना चाहिये।
जब स्त्री अपने मृत पतिके साथ अग्निमें जलती है तो अग्नि उसके शरीरको अवश्य जला देती है, किंतु आत्माको कष्ट नहीं दे पाती है, जिस प्रकार अग्निमें प्रज्वलित धातुओंका मात्र मल ही जलता है, उसी प्रकार अमृतके समान अग्निमें प्रविष्ट हुई नारीका शरीर दग्ध होता है। पुरुष शुद्ध होकर दिव्य देहधारी हो जाता है, जिसके कारण वह खौलते हुए तेल, दहकते हुए लौह तथा अग्निसे कदापि नहीं जलता, इसी प्रकार पतिके साथ चितामें जली हुई स्त्रीको कभी जला हुआ नहीं मानना चाहिये; क्योंकि उसकी अन्तरात्मा मरे हुए पतिकी अन्तरात्मासे मिलकर एक हो जाती है।
यदि स्त्री पतिका साथ छोड़ करके अन्यत्र अपने प्राणोंका परित्याग करती है तो वह पतिलोकमें तबतक नहीं पहुँच पाती, जबतक प्रलय नहीं हो जाता। धन-दौलतसे युक्त माता-पिताको छोड़कर जो स्त्री अपने मरे हुए पतिका अनुगमन करती है, वह चिरकालतक सुखोपभोग करती है। वह पतिसंयुक्ता नारी उस स्वर्गमें साढ़े तीन करोड़ दिव्य वर्षोंतक नक्षत्रोंके साथ स्वर्गमें रहकर अन्तमें महती प्रीति प्राप्त करके ऐश्वर्यसम्पन्न कुलमें उत्पन्न होती है।
धर्मपूर्वक विवाहिता जो स्त्री यदि पति-संगति नहीं करती है, तो जन्म-जन्मान्तरतक दुखी, दुःशीला और अप्रियवादिनी होती है। जो स्त्री अपने पतिको छोड़कर परपुरुषकी अनुगामिनी हो जाती है, वह अन्य जन्मोंमें चमगादड़ी, छिपकली, गोहनी अथवा द्विमुखी सर्पिणी होती है। अतः स्त्रीको मन-वाणी और कर्म—इन सभीके द्वारा प्रयत्नपूर्वक अपने मृत या जीवित पतिकी सेवा करनी चाहिये। पतिके जीवित रहते हुए अथवा उसके मरनेपर जो स्त्री व्यभिचार करती है, वह अनेक जन्मोंतक वैधव्य जीवन प्राप्त करती है और दुर्भाग्य उसका साथ नहीं छोड़ता। देवता और पितरोंको श्रद्धापूर्वक जो कुछ दिया जाता है, उसका समग्र फल उसे पतिकी पूजा करनेसे ही प्राप्त हो जाता है, इसलिये स्त्रीको पतिकी ही पूजा करनी चाहिये।
हे पक्षिश्रेष्ठ! पातिव्रत्यधर्मरूप सत्कर्मका पालन करनेपर स्त्री चिरकालतक पतिलोकमें निवास करती है। जबतक सूर्य और चन्द्र विद्यमान हैं, तबतक वह स्वर्गमें देवतुल्य बनी रहती है। उसके बाद दीर्घायु प्राप्त करके इस लोकमें वैभवशाली कुलमें जन्म लेती है तथा कभी भी पति-वियोगका दुःख नहीं झेलती।
हे खगराज! मैंने यह सब तुम्हें बता दिया। अब मृत प्राणीको सुख प्रदान करनेवाले विशेष कर्मको बताऊँगा। मृत्युके बाद द्वादशाहके दिन यथाविधि सपिण्डनादि समस्त कार्य करके वर्षपर्यन्त प्रतिदिन जलपूर्ण घट और अन्नका दान एवं मासिक श्राद्ध करना चाहिये। हे पक्षिन्! प्रेतकार्यको छोड़कर अन्य किये हुए कार्यकी आवृत्ति नहीं होनी चाहिये।* यदि कोई मनुष्य अन्य कर्म करता है तो पूर्वका किया गया कार्य विनष्ट हो जाता है। मृतकके द्वादशाहके दिन विहित कृत्य वर्षपर्यन्त पुनः करने चाहिये, इससे प्रेत अक्षयसुख प्राप्त
* उत्तम षोडशी आदि जो प्रेतोद्देश्यक कार्य हैं सपिण्डनके बाद भी इनकी पुनरावृत्ति ऊनमासिक आदि श्राद्धके द्वारा वर्षपर्यन्त करना चाहिये। परंतु पितरोंके उद्देश्यसे किये गये कर्मकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिये—
द्वादशाहे कृतं सर्वं वर्षं यावत्सपिण्डनम्। पुनः कुर्यात्सदा नित्यं घटान्नं प्रतिमासिकम् ॥
कृतस्य करणं नास्ति प्रेतकार्यादृते खग। यः करोति नरः कश्चित्कृतपूर्वं विनश्यति ॥
मृतस्यैव पुनः कुर्यात्प्रेतोऽक्षय्यमवाप्नुयात्। प्रतिमासं घटा देया सोदना जलपूरिताः ॥
अर्वाक्च वृद्धेः करणाच्च तार्क्ष्य सपिण्डनं यः कुरुते हि पुत्रः। तथापि मासं प्रतिपिण्डमेकमन्नं च कुम्भं सजलं च दद्यात् ॥
(२६।६४–६७)