भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 558, कुल 634 में से

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पृष्ठ 558

५४८ संक्षिप्त गरुडपुराण [ धर्मकाण्ड-

प्रसन्नता होती है। प्रेतका उद्धार करनेके लिये इस महादानको करना चाहिये। ऐसे महादानका दाता चिरकालतक रुद्रलोकमें रहता है, तदनन्तर इस लोकमें जन्म लेकर रूपसम्पन्न, सौभाग्यशाली, वाक्चतुर, लक्ष्मीवान् और अप्रतिहत-पराक्रमी राजा होता है। अपने सुकृतोंसे यमलोकको जीतकर वह स्वर्गलोकमें जाता है। जो प्राणी ब्राह्मणको गौ, तिल, भूमि तथा स्वर्णका दान देता है, उसके जन्म-जन्मार्जित सभी पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाते हैं। तिल और गौका दान महादान है, इसमें महापापोंको नाश करनेकी शक्ति होती है। ये दोनों दान केवल विप्रको देने चाहिये, अन्य वर्णोंको नहीं। दानके रूपमें संकल्पित तिल, गौ तथा पृथ्वी आदि द्रव्य, अपने पोष्य-वर्ग एवं ब्राह्मणेतर वर्णको न दे। पोष्यवर्ग और स्त्री-जातिको असंकल्पित वस्तु दानमें देनी चाहिये। रुग्णावस्थामें अथवा सूर्य एवं चन्द्रग्रहणके अवसरपर दिये गये दान विशेष महत्त्व रखते हैं। रोगीके लिये जो दान दिया जाता है, वह उसके लिये तत्काल यथोचित फल देनेवाला होता है। यदि रोगी दान देनेके बाद रोगमुक्त होकर पुनः जीवन प्राप्त कर लेता है तो उसके निमित्त दिया गया दान निश्चित ही उसे प्राप्त होता है। विकलेन्द्रियकी विकलांगताको नष्ट करनेके लिये जो दान दिया जाता है वह दान भी अवश्य ही यथायोग्य फलदायक होता है। जिस दानका पुत्र अनुमोदन करता है, उस दानका फल अनन्त होता है। अतः उसके सगे-सम्बन्धी अथवा पुत्रको तबतक दान देना चाहिये, जबतक उसका आतुर सम्बन्धी या पिता जीवित हो; क्योंकि अतिवाहिक प्रेत उसका भोग करता है।

अस्वस्थ-अवस्थामें—आतुरकालमें देहपात हो जानेपर पृथ्वीपर पड़े रहनेकी स्थितिमें दिया गया दान अतिवाहिक शरीरके लिये प्रीतिकारक होता है। लँगड़े, अंधे, काने और अर्धनिमीलित नेत्रवाले रोगीके लिये तिलके ऊपर कुश बिछाकर उसके ऊपर आतुरको लिटाकर दिया गया दान उत्तम और अक्षय होता है।

तिल, लौह, स्वर्ण, रुई, नमक, सप्तधान्य, भूमि तथा गौ—ये एकसे बढ़कर एक पवित्र माने गये हैं। लौह-दानसे यमराज और तिल-दानसे धर्मराज संतुष्ट होते हैं। नमकका दान करनेपर प्राणीको यमराजसे भय नहीं रह जाता। रुईका दान देनेपर भूतयोनिसे भय नहीं रहता। दानमें दी गयी गायें मनुष्यको त्रिविध पापोंसे निर्मुक्त करती हैं। स्वर्ण-दानसे दाताको स्वर्गका सुख प्राप्त होता है। भूमि-दानसे दाता राजा होता है। स्वर्ण और भूमि—इन दोनोंका दान देनेसे प्राणीको नरकमें किसी प्रकारकी पीड़ा नहीं होती। यमलोकमें जितने भी यमराजके दूत हैं, वे सभी उसी यमके समान ही महाभयंकर हैं। सप्तधान्यका दान देनेसे वे प्रसन्न होकर दानदाताओंके लिये वरदाता बन जाते हैं।

हे गरुड! भगवान् विष्णुका स्मरणमात्र करनेसे प्राणीको परम गति प्राप्त होती है। मनुष्य जो गति प्राप्त करता है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। पिताकी आज्ञासे जो पुत्र दान देता है, उसकी सभी प्रशंसा करते हैं। भूमिपर सुलाये गये मरणासन्न पिताके उद्देश्यसे जो पुत्र सभी प्रकारका दान देता है, वह पुत्र कुलनन्दन है। उसके द्वारा दिया गया दान गया-तीर्थमें किये गये श्राद्धसे भी बढ़कर है। वह पुत्र अपने कुलको आनन्दित करनेवाला होता है। जिस समय अपने लोकको छोड़कर बेचैन पिताकी परलोक-यात्राका काल समीप हो, उस समय पुत्रोंको प्रयत्नपूर्वक दान देना चाहिये; क्योंकि वे ही दान पिताको पार करते हैं। पुत्रको पिताकी अन्त्येष्टि-क्रिया अवश्य सम्पन्न करनी चाहिये।

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