भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 575, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 575

प्रेतकल्प ] इष्टापूर्तकर्मकी महिमा तथा और्ध्वदैहिक कृत्य ५६५


आभूषण एवं गौसे युक्त घरेलू उपकरणोंसे परिपूर्ण घर उसको दानमें दे। तदनन्तर पञ्चरत्न, फल और अक्षतसे समन्वित अर्घ्य उस ब्राह्मणको देकर यह प्रार्थना करनी चाहिये—

यथा न कृष्णशयनं शून्यं सागरकन्यया।
शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा जन्मनि जन्मनि॥
(३४।८१)

जिस प्रकार समुद्रकी पुत्री लक्ष्मीसे भगवान् विष्णुकी शय्या शून्य नहीं होती है, उसी प्रकार जन्म-जन्मान्तरमें मेरी शय्या भी शून्य न हो।

इस प्रकार ब्राह्मणको उस निर्मल शय्याका दान देकर क्षमापन करके उसे विदा करे। यही प्रेतशय्याकी विधि एकादशाह-संस्कारमें बतायी गयी है।

हे गरुड! अपने बान्धवकी मृत्यु होनेपर उनके निमित्त बन्धुजन धर्मार्थ जो दान देते हैं, उसके विषयमें विशेष बात मैं कह रहा हूँ, उसको तुम सुनो।

हे पक्षिराज! अपने घरमें पहलेसे जो कुछ उपयुक्त वस्तु हो, उस मृतकके शरीरसे सम्बन्धित जो वस्त्र, पात्र और वाहन हो, जो कुछ उसको अभीष्ट रहा हो, वह सब एकत्र करे। शय्याके ऊपर भगवान् विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमाको स्थापित करके विद्वान् व्यक्ति उनकी पूजा करे और जैसा पहले कहा गया है, उसीके अनुसार ब्राह्मणको उस मृतशय्याका दान कर दे।

शय्यादानके प्रभावसे प्राणीको प्राप्त होनेवाला सम्पूर्ण सुख इन्द्र और यमराजके घरमें विद्यमान रहता है। इसके प्रभावसे महाभयंकर मुखवाले यमदूत उसको पीड़ित नहीं करते हैं। वह मनुष्य यमलोकमें कहीं धूप और ठंडकसे कष्ट नहीं पाता है। शय्यादानके प्रभावसे प्रेत बन्धनमुक्त हो जाता है। इस दानसे पापी व्यक्ति भी स्वर्गलोक चला जाता है। जो प्राणी पापसे रहित है, वह अप्सराओंसे सेवित विमानपर चढ़कर प्रलयपर्यन्त स्वर्गमें रहता है। जो नारी अपने पतिके लिये नवक, षोडश और सांवत्सरिक श्राद्ध तथा शय्यादान करती है, उसको अनन्त फल प्राप्त होता है। मृत पतिका उपकार करनेके लिये जो स्त्री जीवित रहती है, उसके साथ मरती नहीं तो वह सती जीवित रहते हुए भी अपने पतिका उद्धार कर सकती है। स्त्रीको अपने मृत पतिके लिये दधि, अन्न, शयन, अञ्जन, कुंकुम, वस्त्राभूषण तथा शय्यादि सभी प्रकारके दान देना चाहिये। स्त्रियोंके लिये इस लोकमें जो कुछ वस्तुएँ उपकारक हों, जो कुछ शरीरपर प्रयोग किये जाने योग्य वस्त्राभूषण और भोग्य वस्तुएँ हों, उन सभीको मिला करके प्रेतकी प्रतिमा बनाकर उन्हें यथास्थानपर नियोजित करके लोकपाल, इन्द्रादि देवगण, सूर्यादिक ग्रह, गौरी तथा गणेशकी पूजा करे। उसके बाद श्वेत वस्त्र धारण करके पुष्पाञ्जलि सहित ब्राह्मणके समक्ष इस मन्त्रका उच्चारण करे—

प्रेतस्य प्रतिमा ह्येषा सर्वोपकरणैर्युता।
सर्वरत्नसमायुक्ता तव विप्र निवेदिता॥
आत्मा शम्भुः शिवा गौरी शक्रः सुरगणैः सह।
तस्माच्छय्याप्रदानेन सैष आत्मा प्रसीदतु॥
(३४।९६-९७)

हे विप्रदेव! प्रेतकी यह प्रतिमा सभी उपकरणों और समस्त रत्नोंसे युक्त है। मैं आपको इसे प्रदान करता हूँ। आत्मा ही शिव है। यही शिवा और गौरी है। यही सभी देवताओंके साथ इन्द्र है। अतः इस शय्यादानसे यह आत्मा प्रसन्न हो।

इसके बाद उस शय्याको परिवारवाले आचार्य ब्राह्मणको प्रदान करे। ब्राह्मण उसको ग्रहण करनेके बाद ‘कोऽदात्०’ इत्यादि मन्त्रका पाठ करे। तत्पश्चात् उस ब्राह्मणकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम