भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५६८संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

जो पुत्र अन्य श्राद्ध करता है, निस्सन्देह सात जन्मोंमें किये गये अपने धर्मसे हीन हो जाता है। पिण्डोदक क्रियादिसे रहित प्राणी प्रेत हो जाते हैं, वे इसी रूपमें भूख-प्याससे अत्यन्त पीड़ित होकर वायुके साथ चक्कर काटते हैं। यदि पिता प्रेतयोनियोंमें पहुँच जाता है तो पुत्रके द्वारा की गयी समस्त पैतृकी क्रिया नष्ट हो जाती है। यदि माताकी मृत्यु हो जाती है तो पितृकार्य नष्ट नहीं होता है। | यदि माताकी मृत्यु हो जाय, पिता और पितामही अर्थात् दादी जीवित रहती है तो माताका सपिण्डन प्रपितामहीके* साथ ही करना चाहिये। हे गरुड! मेरे इस वचनको सुनो। यह सर्वथा सत्य है। इस पृथ्वीपर जिन मरे हुए मनुष्योंका पिण्डमेलन अर्थात् सपिण्डीकरण नहीं होता है, उनके लिये पुत्रोंके द्वारा अनेक प्रकारसे दिया गया हन्तकार, उपहार, श्राद्ध तथा जलाञ्जलि उन्हें प्राप्त नहीं होती है। (अध्याय ३४)


सपिण्डीकरण-श्राद्धमें प्रेतपिण्डके मेलनका विधान, पितरोंकी प्रसन्नताका फल, पञ्चक-मरण तथा शान्तिविधान, पुत्तलिकादाह, प्रेतश्राद्धमें त्याज्य अठारह पदार्थ, मलिनषोडशी, मध्यमषोडशी तथा उत्तमषोडशी श्राद्ध, शवयात्रा-विधान

ताक्ष्यने कहा— हे जनार्दन! अब मुझे दूसरा संदेह उत्पन्न हो गया है। यदि किसी भी पुरुषकी माताका देहावसान हो गया है, किंतु उसकी पितामही, प्रपितामही, वृद्धप्रपितामही जीवित है और यदि पिता भी जीवित हो, मातामह, प्रमातामह एवं वृद्धप्रमातामह भी जीवित हों तो उस माताका सपिण्डन किसके साथ किया जायगा? हे प्रभो! इसको बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिन्! पूर्वमें कहे गये सपिण्डीकरणविधानको मैं पुनः कह रहा हूँ। यदि माताके उपर्युक्त सभी सम्बन्धी जीवित हैं तो माताके पिण्डका सम्मेलन उमा, लक्ष्मी तथा सावित्रीके साथ कर देना चाहिये। इस संसारमें तीन पुरुष पिण्डका भोग करनेवाले हैं, तीन पुरुष त्याजक हैं, तीन पुरुष पिण्डानुलेप और दसवाँ पुरुष पंक्तिसंनिध होता है। पिता तथा माताके कुलमें इन्हीं पुरुषोंकी प्रसिद्धि होती है। यजमान अपनेसे पूर्व दस पुरुषों एवं अपनेसे बादके दस पुरुषोंका उद्धार कर सकता है। पहले जो तीन पुरुष बताये गये हैं अर्थात् पिता, पितामह तथा प्रपितामह—ये सपिण्डीकरण करनेपर सपिण्ड माने गये हैं। जो प्रपितामहके पूर्व वृद्धप्रपितामह और उनसे दो पूर्व पुरुष हैं, उन्हें त्याजक रूपमें स्वीकार करना चाहिये। इस अन्तिम त्याजक पुरुषके बाद जो पुरुष होता है, वह प्रथम लेपक होता है, उसके पूर्वमें जो अन्य दो पुरुष होते हैं, उन्हें भी उसी लेपककी कोटिमें समझना चाहिये। इस कोटिके तीसरे पुरुषके पूर्व जो पुरुष होता है, वह पंक्तिसंनिध है। इस प्रकार दस पूर्व पुरुषोंके बाद स्वयं यजमान एक पुरुष है। भविष्यमें जो


* 'विनापि प्रत्ययं पूर्वोत्तरपदयोर्वा लोपो वाच्यः'—इस वार्तिकसे 'प्र' शब्दका लोप हो जानेसे मूलमें पितामही पदको 'प्रपितामही' समझना चाहिये।