गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 580, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५७० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड— |
|---|
उच्चारण और पितृशब्दोच्चार नहीं करना चाहिये<sup>१</sup>। इस श्राद्धमें 'अनु' शब्दका प्रयोग, आवाहन तथा उल्मुख वर्जित है। आसीमान्तेगमन, विसर्जन, प्रदक्षिणा, तिल-होम और पूर्णाहुति तथा बलिवैश्वदेव भी नहीं करना चाहिये। यदि कर्ता ऐसा करता है तो उसे अधोगति प्राप्त होती है<sup>३</sup>।
प्रथम षोडशीको मलिन-श्राद्धके नामसे अभिहित किया जाता है। यथा—मृत्युस्थान, द्वार, अर्धमार्ग, चितामें, (श्मशानवासी प्राणियों एवं पड़ोसियोंके उद्देश्यसे) शवके हाथमें तथा छठा श्राद्ध अस्थि-संचय-कालमें होता है। उसके बाद दस पिण्ड-श्राद्ध जो प्रतिदिन एक-एक करके दस दिन किये जाते हैं, वे भी मलिन-श्राद्धकी कोटिमें आते हैं। इस प्रकार इन्हें प्रथम षोडश श्राद्ध कहा गया है। हे तार्क्ष्य! अन्य मध्यम या द्वितीय षोडशीको भी तुम मुझसे सुनो।
इन षोडश श्राद्धोंकी क्रियामें सबसे पहले विधिवत् एकादश श्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु, शिव, यम और तत्पुरुषके नामसे पाँच श्राद्ध हों, ऐसा तत्त्वचिन्तकोंने कहा है। हे खगेश! इन षोडश श्राद्धोंके बाद प्रतिमास एक श्राद्धके अनुसार बारह श्राद्ध, ग्यारहवें मासमें ऊनाब्दिक श्राद्ध, त्रिपाक्षिक श्राद्ध, ऊनमासिक और ऊनषाण्मासिक श्राद्ध करनेका विधान है। शव-शोधनके लिये आद्य श्राद्ध करके तथा अन्य त्रिषोडश श्राद्ध करके पितृपंक्तिकी विशुद्धिके लिये पचासवें श्राद्धसे मिलाना चाहिये। जिसका पचासवाँ श्राद्ध नहीं किया गया है, वह पितृपंक्तिमें मिलने योग्य नहीं है। उक्त त्रिषोडश अर्थात् अड़तालीस श्राद्धोंसे मृत प्राणीके प्रेतत्वका विनाश होता है। उनचास श्राद्ध हो जानेपर पंक्तिसंनिध (पितृगणोंका सामीप्य) प्राणीको मिल जाता है। पचासवें श्राद्धसे पितृके साथ संधि-मेलन करना चाहिये।
अब शव-विधि बतायी जाती है। शव-यात्रा प्रारम्भ करनेके पूर्व बनायी गयी पालकीमें शवके हाथ-पैर बाँध देना चाहिये। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो वह पिशाच-योनियोंके हाथ पहुँच जाता है। शवको अकेला नहीं छोड़ना चाहिये। यदि उसको अकेला छोड़ दिया जाता है तो दुष्ट योनियोंके स्पर्शसे उसकी दुर्गति होती है। गाँवके मध्य शव विद्यमान है—ऐसा सुननेके बाद इच्छानुसार यदि भोजन कर लिया जाता है तो उस अन्न और जलको क्रमशः मांस तथा रक्त समझना चाहिये। गाँवके बीच शवके रहनेपर ताम्बूल-सेवन, दन्तधावन, भोजन, स्त्री-सहवास तथा पिण्डदान त्याज्य हैं। स्नान, दान, जप, होम, तर्पण और देवपूजनका कार्य करना भी व्यर्थ ही हो जाता है।
हे पक्षिराज! बन्धु-बान्धव और सगे-सम्बन्धियोंके लिये मृतकालमें ऐसा ही उपर्युक्त व्यवहार अपेक्षित है। इस धर्मके त्यागनेसे प्रेत पाप-संलिप्त हो जाता है। (अध्याय ३५)
१-किन्हीं आचार्योंके मतमें मृत व्यक्तिके अनन्तर उनके अनुयायियोंको 'ये च त्वामनुगच्छन्ति तेभ्यश्च०'—ऐसा उच्चारण करके पिण्डशेषात्र पिण्डके समीपमें दिया जाता है, वह प्रेत-श्राद्धमें नहीं करना चाहिये।
२-श्राद्धमें ब्राह्मण-भोजन करानेके अनन्तर ब्राह्मणके पीछे-पीछे गाँवकी सीमातक जाकर उनकी प्रदक्षिणा करके उनका विसर्जन किया जाता है। यह आसीमान्तगमन प्रेत-श्राद्धमें नहीं करना चाहिये।
३-अष्टादशैव वस्तूनि प्रेतश्राद्धे विवर्जयेत्। आशिषो द्विगुणान् दर्भान् प्रणवान् नैकपिण्डताम्॥
अनौकरणमुच्छिष्टं श्राद्धं वै वैश्वदैविकम्। विकिरं च स्वधाकारं पितृशब्दं न चोच्चरेत्॥
अनुशब्दं न कुर्वीत नावाहनमथोल्युकम्। आसीमान्तं न कुर्वीत प्रदक्षिणविसर्जनम्॥
न कुर्यात् तिलहोमं च द्विजः पूर्णाहुतिं तथा। न कुर्याद्वैश्वदेवं चेत्कर्ता गच्छत्यधोगतिम्॥ (३५।२९—३२)