भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 582
५७२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

ब्राह्मणोंको बुलाकर जो कुछ उसके पास हो वह सर्वस्व उन्हें दानमें दे दे। ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर वह चान्द्रायणव्रतका पालन करे, सदा सत्य बोले और धर्मका ही आचरण करे।

मृत्युके उद्देश्यसे तीर्थमें जाकर कोई भी मनुष्य पुनः अपने घर वापस आ जाता है तो वह ब्राह्मणोंकी आज्ञा प्राप्त करके प्रायश्चित्त करे। स्वर्ण, गौ, भूमि, हाथी और घोड़ेका दान करके जो मनुष्य मृत्युकालमें तीर्थमें पहुँच जाय, वह भाग्यवान् है। मरण-कालके संनिकट होनेपर घरसे तीर्थके लिये प्रस्थान करनेवाले व्यक्तिको पग-पगपर गोदानका फल प्राप्त होता है, यदि उससे हिंसा न हो। घरमें जो पाप किया गया है, वह तीर्थ-स्नानसे शुद्ध हो जाता है। परंतु यदि प्राणी तीर्थमें पाप करता है तो वह वज्रलेपके समान हो जाता है<sup></sup>। जबतक सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्र आकाशमें विद्यमान रहते हैं, तबतक वह निस्संदेह कष्ट झेलता है। वहाँपर दिये गये दानोंका फल प्राप्त नहीं होता है। आतुरावस्थामें निर्धन प्राणियोंको विशेष रूपसे गौ, तिल, स्वर्ण तथा सप्तधान्यका दान करना चाहिये।

दान देनेवाले पुरुषको देखकर सभी स्वर्गवासी देवता, ऋषि तथा चित्रगुप्तके साथ धर्मराज प्रसन्न होते हैं। जबतक अपने द्वारा अर्जित धन है, तबतक ब्राह्मणको उसका दान देना चाहिये; क्योंकि मरनेपर वह सब पराधीन ही हो जायगा<sup></sup>। वैसी स्थितिमें दयावान् बन करके भला कौन दान देगा? मृत पिताके पारलौकिक सुखके उद्देश्यसे जो पुत्र ब्राह्मणको दान देता है, उससे वह पुत्र-पौत्र और प्रपौत्रोंके साथ धनवान् हो जाता है। पिताके निमित्त दिया गया दान सौ गुना, माताके लिये हजार गुना, बहनके लिये दस हजार गुना, सहोदर भाईके लिये किया गया दान असंख्य गुना पुण्य प्रदान करनेवाला होता है। यदि लोभ, प्रमाद अथवा व्यामोहसे ग्रसित होकर लोग अपने मृतकोंके लिये दान नहीं देते हैं तो सभी मरे हुए प्राणी यह सोचते हैं कि मेरे परिवारके सगे सम्बन्धी कंजूस और पापी हैं। अत्यन्त कष्टसे अर्जित और स्वभावतः चञ्चल धनकी गति मात्र एक ही है और वह है दान। उसकी दूसरी गति तो विपत्ति ही है<sup></sup>

यह मेरा पुत्र है, ऐसा समझकर पुत्रसे प्रेम करनेवाले अपने पतिको देख करके जिस प्रकार दुराचारिणी स्त्री उसका उपहास करती है, उसी प्रकार मृत्यु शरीरके रक्षक और पृथ्वी धनके रक्षकका उपहास करती है। हे तार्क्ष्य! जो मनुष्य उदार, धर्मनिष्ठ तथा सौम्य स्वभावसे युक्त है, वह अपार धन प्राप्त करके भी अपनेको तथा धनको तिलके समान तुच्छ मानता है। ऐसे उदात्त चरित्रवाले श्रेष्ठ पुरुषको अर्थोपद्रव नहीं होता है, उसको किसी प्रकारका मोहजाल अपने चक्करमें नहीं जकड़ पाता है। मृत्युकालमें यमदूतोंके द्वारा उत्पन्न किया गया किसी प्रकारका भय उसके सामने टिकनेमें समर्थ नहीं होता है।

हे काश्यप! धर्मकी रक्षा या किसीके उद्देश्यसे जलमें डूब करके प्राणोत्सर्ग करनेसे सात हजार वर्ष, अग्निमें कूदकर आत्मदाह करनेपर ग्यारह हजार वर्ष, वायुके वेगमें जीवनलीला समाप्त करनेपर सोलह हजार वर्ष, युद्धभूमिमें वीरगति प्राप्त करनेपर साठ हजार वर्ष तथा गोरक्षार्थ मरण होनेपर अस्सी हजार वर्षतक स्वर्गकी प्राप्ति होती है, किंतु निराहारव्रतका पालन करते हुए प्राणोंका परित्याग करनेपर व्यक्तिको अक्षयगतिका लाभ होता है<sup></sup>(अध्याय ३६)


१-गृहात् प्रचलितस्तीर्थं मरणे समुपस्थिते। पदे पदे तु गोदानं यदि हिंसा न जायते॥
गृहे तु यत् कृतं पापं तीर्थस्नानेन शुध्यति। कुरुते तत्र पापं चेद्वज्रलेपसमं हि तत्॥ (३६। २४-२५)
२-आत्मायत्तं धनं यावत् तावद् विप्रे समर्पयेत्। पराधीनं मृते सर्वं कृपया कः प्रदास्यति ॥ (३६। २९)
३-पितुः शतगुणं दत्तं सहस्रं मातुरुच्यते। भगिन्या शतसाहस्रं सोदर्ये दत्तमक्षयम्॥
यदि लोभान्न यच्छन्ति प्रमादान्मोहातोऽपि वा। मृताः शोचन्ति ते सर्वे कदर्याः पापिनस्त्विति॥
अतिकलेशेन लब्धस्य प्रकृत्या चञ्चलस्य च। गतिरेकैव वित्तस्य दानमन्या विपत्तयः॥ (३६। ३१-३३)
४-समाः सहस्राणि च सप्त वै जले दशैकमग्नौ पवने च षोडश। महाहवे षष्टिरशीतिगोग्रहे अनाशके काश्यप चाक्षया गतिः॥ (३६। ३७)