भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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प्रेतकल्प ] तीर्थमरणकी महिमा ५७५


रोपणात् पालनात् सेकाद्दर्शनात्स्पर्शनात्कीर्तनात्।
तुलसी दहते पापं नृणां जन्मार्जितं खग॥
(३८।११)

राग-द्वेषरूपी मलको दूर करनेमें समर्थ, ज्ञानरूपी जलाशयके सत्यरूपी जलसे युक्त मानसतीर्थमें जिस मनुष्यने स्नान कर लिया है, वह कभी पापोंसे संलिप्त नहीं होता। देवता कभी काष्ठ और पत्थरकी शिलामें नहीं रहते, वे तो प्राणीके भावमें विराजमान रहते हैं। इसलिये सद्भावसे युक्त भक्तिका सम्यक् आचरण करना चाहिये—

ज्ञानह्रदे सत्यजले रागद्वेषमलापहे।
यः स्नातो मानसे तीर्थे न स लिप्येत पातकैः॥
न काष्ठे विद्यते देवो न शिलायां कदाचन।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावं समाचरेत्॥
(३८। १२-१३)

मछुवारे प्रतिदिन प्रातःकाल जाकर नर्मदा नदी (पुण्य तीर्थ)-का दर्शन करते हैं; किंतु वे शिवलोक नहीं पहुँच पाते हैं; क्योंकि उनकी चित्तवृत्ति बलवान् होती है। मनुष्योंके चित्तमें जैसा विश्वास होता है, वैसा ही उन्हें अपने कर्मोंका फल प्राप्त होता है। वैसी ही उनकी परलोक-गति होती है।

ब्राह्मण, गौ, स्त्री और बालककी हत्या रोकनेके लिये जो व्यक्ति अपने प्राणोंका बलिदान करनेमें तत्पर रहता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है—

ब्राह्मणार्थे गवार्थे च स्त्रीणां बालवधेषु च।
प्राणत्यागपरो यस्तु स वै मोक्षमवाप्नुयात्॥
(३८। १६)

जो निराहार व्रतके द्वारा मृत्यु प्राप्त करता है, उसे भी मुक्ति प्राप्त होती है। वह सभी बन्धनोंसे निर्मुक्त हो जाता है। ब्राह्मणोंको दान देनेसे मनुष्य मोक्षको प्राप्त कर सकता है।

हे गरुड! सभी प्राणियोंके लिये जैसे मोक्षमार्ग हैं, वैसे ही स्वर्गके मार्ग भी हैं। यथा—गोशालामें, देश-विध्वंस होनेपर, युद्धभूमि एवं तीर्थस्थलमें मृत्यु श्रेयस्कर है। प्राणी वहाँ अपने शरीरका परित्याग करके चिरकालतक स्वर्गवासका लाभ ले सकता है। पण्डितको जीवन और मरण इन दो तत्त्वोंपर ही ध्यान देना चाहिये। अतः वे दान तथा भोगसे जीवन धारण करें और युद्धभूमि एवं तीर्थमें मृत्युको प्राप्त करें। जो मनुष्य हरिक्षेत्र, कुरुक्षेत्र, भृगुक्षेत्र, प्रभास, श्रीशैल, अर्बुद (आबू पर्वत), त्रिपुष्कर तथा शिवक्षेत्रमें मरता है, वह जबतक ब्रह्माका एक दिन पूरा नहीं हो जाता, तबतक स्वर्गमें रहता है। उसके बाद वह पुनः पृथ्वीपर आ जाता है। जो व्यक्ति सच्चरित्र ब्राह्मणको एक वर्षतक जीवन-निर्वाहके लिये अन्न-वस्त्रादिका दान देता है, वह सम्पूर्ण कुलका उद्धार करके स्वर्गलोकमें निवास करता है।

जो अपनी कन्याका विवाह वेदपारंगत ब्राह्मणके साथ करता है, वह अपने कुल-परिवारके सहित इन्द्रलोकमें निवास करता है। महादानोंको देकर भी मनुष्य ऐसा ही फल प्राप्त करता है। वापी, कूप, जलाशय, उद्यान एवं देवालयोंका जीर्णोद्धार करनेवाला पूर्व कर्ताकी भाँति फल प्राप्त करता है अथवा जीर्णोद्धारसे कर्ताका पुण्य दुगुना हो जाता है। जो मनुष्य विद्वान् ब्राह्मणके परिवारकी शीत, वायु और धूपसे रक्षा करनेके लिये घास, फूस और पत्तोंसे बनी झोपड़ीका दान देता है, वह साढ़े तीन करोड़ वर्षतक स्वर्गमें निवास करता है।

जो सवर्णा सती स्त्री अपने मृत पतिका अनुगमन करे, वह मृत्युके बाद शरीरमें रोमोंकी जितनी संख्या है, उतने वर्षोंतक स्वर्गका भोग करती है। पुत्र-पौत्रादिका परित्याग करके जो अपने पतिका अनुगमन करती है, वे दोनों पति-पत्नी दिव्य स्त्रियोंसे अलंकृत होकर स्वर्गका सुख-वैभव प्राप्त करते हैं। सदैव पतिसे द्रोह रखनेवाली

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