भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 589

प्रेतकल्प ] दुर्मृत्यु होनेपर सद्गतिलाभके लिये नारायणबलिका विधान ५७९

वस्त्र, सभी प्रकारके धान्य, दूध तथा मधुका दान ब्राह्मणको दे। वस्त्र और पादुकासे युक्त आठ प्रकारके पददान बिना पंक्तिभेद किये (समानरूपसे) सभी ब्राह्मणोंको इस अवसरपर देना चाहिये।

पृथ्वीपर पिण्डदान हो जानेके पश्चात् शङ्खपात्र तथा ताम्रपात्रमें पृथक्-पृथक् गन्ध-अक्षत-पुष्पयुक्त तर्पण करे। ध्यान-धारणासे एकाग्र मन हो, घुटनोंके बल पृथ्वीपर टिक करके, वेद-शास्त्रोंके अनुसार सभी ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये। एकोद्दिष्ट श्राद्धमें ऋचाओंसे पृथक्-पृथक् अर्घ्य देना चाहिये। उस समय 'आपोदेवीर्मधुमती०' इत्यादि मन्त्रसे पहले पिण्डपर अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। उसके बाद 'उपयाम गृहीतोऽसि०' इस मन्त्रसे दूसरे, 'येनापावक चक्षुषा०' मन्त्रसे तीसरे, 'ये देवासः०' मन्त्रसे चौथे, 'समुद्रं गच्छ०' मन्त्रसे पाँचवें, 'अग्निर्ज्योति०' मन्त्रसे छठे, 'हिरण्यगर्भ०' मन्त्रसे सातवें, 'यमाय०' मन्त्रसे आठवें, 'यज्जाग्र०' मन्त्रसे नवें, 'या फलिनी०' मन्त्रसे दसवें तथा 'भद्रं कर्णेभिः०' मन्त्रसे ग्यारहवें पिण्डपर अर्घ्य प्रदान करके उनका विसर्जन करे।

एकादशदैवत्य श्राद्ध करके दूसरे दिन श्राद्ध आरम्भ करे। उस दिन चारों वेदके ज्ञाता, विद्याशील और सद्गुण-सम्पन्न, वर्णाश्रम-धर्मपालक, शीलवान्, श्रेष्ठ, अविकल अङ्गोंवाले प्रशस्त और कभी त्याज्य न होनेयोग्य उत्तम पाँच ब्राह्मणोंका आवाहन करे। तदनन्तर सुवर्णसे विष्णु, ताम्रसे रुद्र, चाँदीसे ब्रह्मा, लोहेसे यम, सीसा अथवा कुशसे प्रेतकी प्रतिमा बनवा करके 'शन्नोदेवी०' इस मन्त्रसे विष्णुदेवको पश्चिम दिशामें, 'अग्न आयाहि०' मन्त्रसे रुद्रको उत्तर दिशामें, 'अग्निमीळे' मन्त्रसे ब्रह्माको पूर्व दिशामें, 'इषेत्वोर्जेत्वा०' मन्त्रसे यमको दक्षिण दिशामें तथा मध्यमें मण्डल बनाकर कुशमय नर स्थापित करना चाहिये।

ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, यम और प्रेत-इन पाँचोंके लिये पञ्चरत्नयुक्त कुम्भ अलग-अलग रखे। इन सभी देवताओंके लिये पृथक्-पृथक् रूपसे वस्त्र, यज्ञोपवीत तथा मुद्रा प्रदान करे एवं पृथक्-पृथक् तत्तन्मन्त्रोंसे उनका जप करे। उसके बाद यथाविधि देवोंके निमित्त पाँच श्राद्ध करने चाहिये। तत्पश्चात् शङ्ख अथवा ताम्रपात्र या इनके अभावमें मिट्टीके पात्रमें सर्वौषधिसमन्वित तिलोदक लेकर पृथक्-पृथक् पीठपर प्रदान करे। हे खगेश्वर! आसन, पादुका, छत्र, अँगूठी, कमण्डलु, पात्र, भोजन-पदार्थ और वस्त्र-ये आठ पद माने गये हैं, इनके साथ ही स्वर्ण तथा दक्षिणासे युक्त एक तिलपूर्ण ताम्रपात्र विधिपूर्वक मुख्य ब्राह्मणको दान देना चाहिये। ऋग्वेद-पारंगत ब्राह्मणको हरी-भरी फसलसे युक्त भूमि, यजुर्वेद-निष्णात ब्राह्मणको दूध देनेवाली गाय, शिवके उद्देश्यसे सामवेदका गान करनेवाले ब्राह्मणको स्वर्ण, यमके उद्देश्यसे तिल, लौह और दक्षिणा देनी चाहिये।

सर्वौषधिसे समन्वित कुशद्वारा निर्मित पुरुषाकृति पुत्तलकका निर्माण करके कृष्णाजिनको बिछाकर उसे स्थापित करे और पलाशका विभाग करके तीन सौ साठ वृन्तोंसे पुत्तलककी हड्डियोंका निर्माण करे। यथा-शिरोभागमें चालीस वृन्त, ग्रीवामें दस, वक्षःस्थलमें बीस, उदरमें बीस, दोनों भुजाओंमें सौ, कटिप्रदेशमें बीस, दोनों ऊरुओंमें सौ, दोनों जंघाओंमें तीस, शिश्न-स्थानमें चार, दोनों अण्डकोशोंमें छः और पैरकी अंगुलियोंमें दस वृन्तोंसे उस कल्पित प्रेत-पुरुषकी अस्थियोंका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् उसके शिरोभागपर नारियल, तालुप्रदेशमें लौकी, मुखमें पञ्चरत्न, जिह्वाभागमें केला, आँतोंके स्थानपर कमलनाल, प्राणभागमें बालू, वसाके स्थानपर मेदक नामक अर्क, मूत्रके स्थानपर गोमूत्र, धातुओंके स्थानमें गन्धक, हरिताल