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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

प्रपितामहके लिये, तत्पश्चात् मातामहादिके लिये क्रमशः आसनादिके दानकी क्रिया सम्पन्न करनी चाहिये। यदि मातृश्राद्धमें ब्राह्मणोंका अभाव हो तो श्रेष्ठ परिवारमें उत्पन्न हुई पति-पुत्रसे सम्पन्न सौभाग्यवती आठ साध्वी स्त्रियोंको ही निमन्त्रित किया जा सकता है।

इष्ट और आपूर्त-कृत्योंमें आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। उत्पात आदिकी शान्तिके लिये नित्य-श्राद्धके समान नैमित्तिक श्राद्ध करनेका विधान है।

हे तार्क्ष्य ! जैसा मैंने कहा है, उसी प्रकारसे नित्यश्राद्ध, दैवश्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध, काम्यश्राद्ध तथा नैमित्तिक श्राद्ध—इन पाँचों श्राद्धोंको करता हुआ मनुष्य अपने समस्त अभीष्टोंको प्राप्त करता है। इस तरह मैंने सब बता दिया, अब तुम मुझसे और क्या पूछ रहे हो ? (अध्याय ४५)


सत्कर्मकी महिमा तथा कर्मविपाकका फल

तार्क्ष्यने कहा— हे सुरश्रेष्ठ! मनुष्योंको स्वर्ग और नाना प्रकारके भोग तथा सुख एवं रूप, बल-बुद्धि एवं पराक्रम पुण्यके प्रभावसे प्राप्त होते हैं। पूर्वोक्त प्रकारके लौकिक एवं पारलौकिक भोग पुण्यवान् व्यक्तियोंको उनके पुण्यसे ही प्राप्त होते हैं, अन्यथा नहीं—ये वेदवाक्य सर्वथा सत्य हैं।

जिस प्रकार धर्मकी ही विजय होती है, अधर्मकी नहीं। सत्यकी ही विजय होती है, असत्यकी नहीं। क्षमाकी ही विजय होती है, क्रोधकी नहीं। विष्णु ही विजय प्राप्त करते हैं असुर नहीं—

धर्मो जयति नाधर्मः सत्यं जयति नानृतम्।
क्षमा जयति न क्रोधो विष्णुर्जयति नासुरः॥
(४६।३)

—उसी प्रकार मैंने सत्य-रूपसे यह जाना है कि सुकृतसे ही कल्याण होता है। जिसका पुण्य जितना उत्कृष्टतम है, वह मनुष्य भी उतना ही श्रेष्ठतम है। जिस प्रकार पापी जन्म लेते हैं, जिस कर्मफलके अनुसार जीव जिस भोगका भागी होता है, वह जिन-जिन योनियोंको जिस रूपमें प्राप्त करता है, जैसा उसका रूप होता है वह सब मैं सुनना चाहता हूँ। हे देव! संक्षेपमें आप मेरी इस इच्छित बातको बतानेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा— हे कश्यपपुत्र गरुड! शुभाशुभ फलोंके भोगके अनन्तर जिन लक्षणोंसे युक्त होकर मनुष्य इस लोकमें उत्पन्न होते हैं, उनको तुम मुझसे सुनो।

हे पक्षिश्रेष्ठ! इस लोकमें आत्मज्ञानियोंका शासक गुरु है। दुरात्माओंका शासक राजा है और गुप्तरूपसे पाप करनेवाले प्राणियोंका शासक सूर्य-पुत्र यम है—

गुरुरात्मवतां शास्ता राजा शास्ता दुरात्मनाम्।
इह प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः॥
(४६।८)

अपने पापोंका प्रायश्चित्त न किये जानेपर उन्हें अनेक प्रकारके नरक प्राप्त होते हैं। वहाँकी यातनाओंसे विमुक्त होकर प्राणी मर्त्यलोकमें जन्म लेते हैं। मानवयोनिमें जन्म लेकर वे अपने पूर्व-पापोंके जिन चिह्नोंसे युक्त रहते हैं, मैं उन लक्षणोंको तुम्हें बताऊँगा।

सभी पापी यमराजके घर पहुँचकर नाना प्रकारके कष्ट सहन करते हैं। जब उन यातनाओंसे उन्हें मुक्ति प्राप्त होती है तो उनके पापोंका भावी शरीरपर चिह्नाङ्कन होता है। उन्हीं चिह्नोंसे संयुक्त होकर वे पुनः इस पृथ्वीलोकमें जन्म ग्रहण करते हैं। यथा—असत्यवादी हकलाकर बोलनेवाला, गायके विषयमें झूठ बोलनेवाला गूँगा, ब्रह्महन्ता कोढ़ी, मद्यपी काले रंगके दाँतोंवाला, स्वर्णचोर कुत्सित एवं विकृत नखोंवाला और गुरुपत्नीगामी चर्मरोगी होता है तथा पापियोंसे सम्बन्ध रखनेवाला निम्नयोनिमें जन्म लेता है और दान न देनेवाला

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