गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेतकल्प ] दुःखी गर्भस्थ जीवका विविध प्रकारका चिन्तन करना [ ५९३
शिव, गणेश, चण्डी अथवा सूर्यदेव ही पूजे गये हैं। अतः तुमने जो कर्म किया है, उसीमें अपना निर्वाह करो। हे देहिन्! तुम्हें तो देवत्व प्राप्त करने योग्य मानवयोनिकी प्राप्ति हुई थी, किंतु (लौकिक आसक्तिमें) मोहवश यह सब समास हो गया। विमूढ़बुद्धि तुमने अपनी गतिको नहीं देखा, इसलिये जो तुमने किया है, अब उसीमें निस्तार करो।
हे पक्षिन्! धर्म, अर्थ तथा यशको प्रदान करनेवाले, ऐसे पूर्वोक्त परलोकपथके पथिक जीवोंके पश्चात्ताप-वाक्यका विचार करके इस मनुष्यलोकमें जो धर्माचरण करते हुए पुण्य देशमें निवास करते हैं, वे इसी मनुष्यलोकमें जीवन्मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
ऊपर किये हुए वर्णनके अनुसार विलाप करते हुए प्रेतको यमदूत अपने कालस्वरूप मुद्गरोंसे बहुत मारते हैं। वह ‘हा दैव! हा दैव!’ यह स्मरण करता हुआ अपनेको कोसते हुए कहता है कि तुमने अपनी कमायीसे जो धन अर्जित किया था, उसमेंसे किसीको दान नहीं दिया। पृथ्वीपर रहते हुए तुमने भूमिदान, गोदान, जलदान, वस्त्रदान, फलदान, ताम्बूलदान अथवा गन्धदान भी नहीं किया तो अब भला क्या सोच रहे हो? तुम्हारे पिता और पितामह मर गये, जिसने तुमको अपने गर्भमें धारण किया वह तुम्हारी माता भी मर गयी, तुम्हारे सभी बन्धु भी नहीं रहे, ऐसा तुमने देखा है। तुम्हारा पाञ्चभौतिक शरीर अग्निमें जलकर भस्म हो गया। तुम्हारे द्वारा एकत्र किया गया सम्पूर्ण धन-धान्य पुत्रोंने हस्तगत कर लिया। जो कुछ तुम्हारा सुभाषित है और जो कुछ तुमने धर्मसंचय किया है, वह तुम्हारे साथ है। इस पृथ्वीपर जन्म लेनेवाला राजा हो अथवा संन्यासी या कोई श्रेष्ठतम ब्राह्मण हो, वह मरनेके बाद पुनः आया हुआ नहीं दिखायी देता है। जो भी इस धरातलपर उत्पन्न हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। हे पक्षीन्द्र! दूतोंके सहित धर्मराजके पार्षद जब प्रेतसे इस प्रकारसे कहते हैं तो दुःखी वह प्रेत उन गणोंकी महान् आश्चर्यपूर्ण बातको सुनकर मनुष्यकी वाणीमें कहने लगता है—
जब दानके प्रभावसे व्यक्ति विमानपर आरूढ़ होता है, उस समय धर्म उसका पिता है, दया उसकी माता है, मधुर एवं अर्थगाम्भीर्ययुक्त वाणी उसकी पत्नी है और सुन्दर तीर्थमें किया गया स्नान उसका हितैषी बन्धु है। जब मनुष्य अपने हाथसे सुकृत करके उसको भगवान्के चरणोंमें अर्पित कर देता है, तब उसके लिये स्वर्ग किंकरकी भाँति हो जाता है। जो प्राणी धर्मनिष्ठ है वह अत्यन्त सुख-सुविधाओंको प्राप्त करता है और जो पापी है वह नाना दुःखोंका भोग करता है। जो धर्मशील, मान-सम्मान तथा क्रोधको जीतनेवाला, विद्या-विनयसे युक्त, दूसरेको कष्ट न देनेवाला, अपनी पत्नीमें संतुष्ट और परायी स्त्रीसे दूर रहनेवाला है, वह पृथ्वीपर हमारे लिये वन्दनीय है। जो मिष्टान्नदाता, अग्निहोत्री, वेदान्ती, हजारों चान्द्रायणव्रत करनेवाला, मासपर्यन्त उपवास रखनेमें समर्थ पुरुष तथा पतिव्रता नारी है—ये छः इस जीवलोकमें मेरे लिये वन्दनीय हैं। इस प्रकारका सम्यक् आचरण करते हुए जो मनुष्य वापी, कूप और जलसे पूर्ण तालाब बनवाता है, जो प्याऊ, जलकुण्ड, धर्मशाला तथा देवमन्दिरका निर्माण कराता है, वह उत्तम धर्म करनेवाला है। वेदज्ञ ब्राह्मणको दिया गया वर्षाशन, कन्याका विवाह, ऋणी ब्राह्मणकी ऋणमुक्ति, सुगमतासे बोयी-जोती जानेवाली भूमिका दान तथा प्याससे दुःखी प्राणियोंके लिये उसीके अनुकूल कूप, तड़ागादिका निर्माण ये ही सब सुकृत हैं।
शुद्ध भावसे जो प्राणी इस सुकृतसाररूप अध्यायको सुनता और पढ़ता भी है वह कुलीन है। वह धर्मनिष्ठ व्यक्ति मृत्युके बाद निश्चित ही उस अनन्त ब्रह्माण्डके एकमात्र आश्रय नारायणको प्राप्त करता है।
(अध्याय ४८)