गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेतकल्प ] भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश ५९७
कारणसे प्रेरित होकर बनाया गया है। संसार दुःखका मूल है, वह किसका होकर रहा है अर्थात् इसकी ओर जिसका मन अधिक रम गया है, वही दुःखित है। जिसने इस सांसारिक व्यामोहका परित्याग कर दिया है, वह सुखी है। उसके अतिरिक्त कहींपर भी अन्य कोई दूसरा सुखी नहीं है—
इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत्कृताकृतम्।
एवमीहासमायुक्तं कृतान्तः कुरुते वशम्॥
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्रिकम्।
न हि मृत्युः प्रतीक्षेत कृतं वाप्यथ वाऽकृतम्॥
जरादर्शितपन्थानं प्रचण्डव्याधिसैनिकम्।
अधिष्ठितो मृत्युशत्रुं त्रातारं किं न पश्यति॥
तृष्णासूचीविनिर्भिन्नं सिक्तं विषयसर्पिषा।
रागद्वेषानले पक्वं मृत्युरश्नाति मानवम्॥
बालांश्च यौवनस्थांश्च वृद्धान् गर्भगतानपि।
सर्वानविशते मृत्युरेवम्भूतमिदं जगत्॥
स्वदेहमपि जीवोऽयं मुक्त्वा याति यमालयम्।
स्त्रीमातृपितृपुत्रादिसम्बन्धः केन हेतुना॥
दुःखमूलं हि संसारः स यस्यास्ति स दुःखितः।
तस्य त्यागः कृतो येन स सुखी नापरः क्वचित्॥
(४९।४०–४६)
यह जगत् सभी दुःखोंका जनक, समस्त आपदाओंका घर तथा सब प्रकारके पापोंका आश्रय है। अतः क्षणभरमें ही मनुष्यको इसका त्याग कर देना चाहिये। लौह और काष्ठके जालमें फँसा हुआ पुरुष मुक्त हो सकता है; किंतु पुत्र एवं स्त्रीके मोहजालमें फँसा हुआ वह कभी मुक्त नहीं हो सकता। मनुष्य मनको प्रिय लगनेवाले जितने पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध स्थापित करता जाता है, उतनी शोककी कीलें उसके हृदयमें चुभती जाती हैं। विषयका आहार करनेवाले देहस्थित तथा सभी प्रकारके अशेष सामर्थ्यसे वञ्चित कर देनेवाले जिन इन्द्रियरूपी चोरोंके द्वारा लोक विनष्ट हो रहे हैं। हाय, यह बड़े कष्टकी बात है। जैसे मांसके लोभमें फँसी हुई मछली बंसीके काँटेको नहीं देखती है, वैसे ही सुखके लालचमें फँसा हुआ शरीरी यमकी बाधाको नहीं देखता है—
प्रभवं सर्वदुःखानामालयं सकलापदाम्।
आश्रयं सर्वपापानां संसारं वर्जयेत् क्षणात्॥
लोहदारुमयैः पाशैः पुमान् बद्धो विमुच्यते।
पुत्रदारमयैः पाशैर्मुच्यते न कदाचन॥
यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान् मनसः प्रियान्।
तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कवः॥
वञ्चिताशेषवित्तैस्तैर्नित्यं लोको विनाशितः।
हा हन्त विषयाहारैर्देहस्थेन्द्रियतस्करैः॥
मांसलुब्धो यथा मत्स्यो लोहशंकुं न पश्यति।
सुखलुब्धस्तथा देही यमबाधां न पश्यति॥
(४९।४७–५१)
हे खगेश! अपने हित-अहितको न जानते हुए जो नित्य कुपथगामी हैं, जिनका लक्ष्य मात्र पेट भरना है, वे मनुष्य नारकीय प्राणी हैं। निद्रा, भय, मैथुन तथा आहारकी अभिलाषा सभी प्राणियोंमें समान रूपसे रहती है; उनमें ज्ञानीको मनुष्य और अज्ञानीको पशु माना गया है। मूर्ख व्यक्ति प्रातःकालमें मल-मूत्र, दोपहरमें भूख-प्यास तथा रातमें मैथुन और निद्रासे पीड़ित रहते हैं। बड़े दुःखकी बात है कि अज्ञानसे मोहित होकर सभी प्राणी अपने शरीर, धन एवं स्त्री आदिमें अनुरक्त होकर जन्म लेते हैं और मर जाते हैं। अतः व्यक्तिको उनकी ओर बढ़ी हुई अपनी आसक्तिका परित्याग करना चाहिये। यदि आसक्ति छोड़ी न जा रही हो तो महापुरुषोंके साथ उस आसक्तिको जोड़ देना चाहिये, क्योंकि आसक्ति-रूपी व्याधिकी औषधि सज्जन पुरुष ही हैं—
हिताहितं न जानन्तो नित्यमुन्मार्गगामिनः।
कुक्षिपूरणनिष्ठा ये ते नरा नारकाः खग॥
निद्राभीमैथुनाहाराः सर्वेषां प्राणिनां समाः।
ज्ञानवान् मानवः प्रोक्तो ज्ञानहीनः पशुः स्मृतः॥