भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 634 में से

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पृष्ठ 609

प्रेतकल्प ] भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश ५९९


कहते हैं, किंतु स्वयं उसका अनुभव नहीं करते हैं। वे वेद-शास्त्रोंको पढ़ते हैं और परस्पर उसको जाननेका प्रयास करते हैं; किंतु जैसे कलछी पाकका रसास्वाद नहीं कर पाती है, वैसे ही वे परमतत्त्वको नहीं जान पाते हैं। सिर पुष्पोंको ढोता है, परंतु उसकी सुगन्धका अनुभव नासिका ही करती है। बहुत-से लोग वेद-शास्त्र पढ़ते हैं; किंतु उनके भावको समझनेवाला दुर्लभ है। अपने ही भीतर विद्यमान उस परमतत्त्वको न पहचान कर मूर्ख प्राणी शास्त्रोंमें वैसे ही व्याकुल रहता है, जैसे कछारमें आये हुए बकरी या भेंडके बच्चेको एक गोप कुएँमें खोजता है। सांसारिक मोहको विनष्ट करनेमें शब्दज्ञान समर्थ नहीं है; क्योंकि दीपककी वार्तासे कभी अन्धकारको दूर नहीं किया जा सकता है। बुद्धिरहित व्यक्तिका पढ़ना वैसे ही है, जैसे अन्धेके हाथमें दर्पण हो। अतः प्रज्ञावान् पुरुषोंके द्वारा अधीत शास्त्र तत्त्वज्ञानका लक्षण है। यह ज्ञान है, यह जाननेके योग्य है, ऐसे विचारोंमें फँसा हुआ मनुष्य सब कुछ जाननेकी इच्छा करता है, किंतु हजार दिव्य वर्षोंतक पढ़नेपर भी वह शास्त्रोंका अन्त नहीं समझ पाता है। शास्त्र तो अनेक हैं, किंतु आयु बहुत ही कम है और उसमें भी करोड़ों विघ्न-बाधाएँ हैं। इसलिये जलमें मिले हुए क्षीरको जैसे हंस ग्रहण कर लेता है, वैसे ही उनके सार-तत्त्वको ग्रहण करना चाहिये—

अनेकानि च शास्त्राणि स्वल्पायुर्विघ्नकोटयः ।
तस्मात् सारं विजानीयात् क्षीरं हंस इवाम्भसि ॥
(४९।८४)

हे तार्क्ष्य ! वेद-शास्त्रोंका अभ्यास करके जो बुद्धिमान् व्यक्ति उस परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसको उन सभीका परित्याग उसी प्रकार करना चाहिये, जिस प्रकार एक धान्यार्थी पुरुष धान ग्रहण कर लेता है और पुआलको फेंक देता है। जैसे अमृतके पानसे संतृप्त प्राणीका भोजनसे कोई सरोकार नहीं रह जाता है, वैसे ही तत्त्वको जाननेवाले विद्वान्का शास्त्रसे कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है। हे विनतात्मज ! वेदाध्ययनसे मुक्ति सम्भव नहीं है और न तो शास्त्रोंको पढ़नेसे वह प्राप्त हो सकती है, वह कैवल्य ज्ञानसे ही सुलभ है, किसी अन्य साधनसे नहीं। आश्रम उस मोक्षका कारण नहीं हो सकता है। दर्शन भी उसकी प्राप्तिके कारण नहीं हैं। वैसे ही सभी कर्मोंको उसका कारण नहीं मानना चाहिये। उसका कारण ज्ञान है। मुक्ति देनेवाली गुरुकी एक वाणी है। अन्य सभी विद्याएँ विडम्बना करनेवाली हैं। हजार शास्त्रोंका भार सिरपर होनेपर भी प्राणीको तो संजीवन देनेवाला वह परमतत्त्व अकेला ही है। सभी प्रकारकी क्रियाओंसे रहित वह अद्वैत शिवतत्त्व कहा गया है। उसको गुरुके मुखसे प्राप्त करना चाहिये। वह करोड़ों आगम-शास्त्रोंका अध्ययन करनेसे मिलनेवाला नहीं है।

ज्ञान दो प्रकारका कहा जाता है। एक है शास्त्रकथित ज्ञान और दूसरा है विवेकसे प्राप्त हुआ ज्ञान। इसमें शब्द ही ब्रह्म है, ऐसा आगम-शास्त्र कहते हैं। वह परमतत्त्व ही ब्रह्म है, ऐसा विवेकी जन कहते हैं। कुछ लोग अद्वैतको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं और कुछ लोग द्वैतको चाहते हैं; किंतु वे सभी यह नहीं जानते हैं कि वह परमतत्त्व समभाववाला है। वह द्वैताद्वैतसे रहित है।

बन्धन और मोक्षके लिये इस संसारमें दो ही पद हैं। एक पद है 'यह मेरा है' और दूसरा पद है 'यह मेरा नहीं है'। 'यह मेरा है' इस ज्ञानसे वह बँध जाता है और 'यह मेरा नहीं है' इस ज्ञानसे वह मुक्त हो जाता है—

द्वे पदे बन्धमोक्षाय न ममेति ममेति च ।
ममेति बध्यते जन्तुर्न ममेति प्रमुच्यते ॥
(४९।९३)

जो कर्म इस जीवात्माको बन्धनमें नहीं ले

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