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गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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प्रेतकल्प ] भगवान् विष्णुद्वारा गरुडको दिये गये महत्त्वपूर्ण उपदेश ६०१


जहाँ ज्ञान-वैराग्यसे रहित अहंकारी प्राणी नहीं जाते हैं वहाँ सुधीजन जाते हैं। उनके विषयमें अब तुम्हें बताता हूँ—

मान-मोहसे रहित, आसक्ति-दोषसे परे, नित्य अध्यात्म-चिन्तनमें दत्तचित्त, सांसारिक समस्त कामनाओंसे रहित और सुख-दुःख नामक द्वन्द्वसे मुक्त जो ज्ञानी पुरुष हैं, वे ही उस अव्ययपदको प्राप्त करते हैं—

निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥
(४९।११०)

'जो व्यक्ति ज्ञानरूपी ह्रदमें राग-द्वेष नामवाले मलको दूर करनेवाले सत्यरूपी जलसे भरे हुए मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसीको मोक्ष प्राप्त होता है'—

ज्ञानह्रदे सत्यजले रागद्वेषमलापहे।
यः स्नाति मानसे तीर्थे स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥
(४९।१११)

'प्रौढ़ वैराग्यमें स्थित होकर अनन्यभावसे जो मनुष्य मेरा भजन करता है, वह पूर्ण दृष्टिवाला प्रसन्नात्मा व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है'—

प्रौढवैराग्यमास्थाय भजते मामनन्यभाक्।
पूर्णदृष्टिः प्रसन्नात्मा स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥
(४९।११२)

'घर छोड़कर मरनेकी अभिलाषासे जो तीर्थमें निवास करता है और मुक्ति-क्षेत्रमें मरता है, उसे मुक्ति प्राप्त होती है। अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काञ्ची, अवन्तिका तथा द्वारका—ये सात पुरियाँ मोक्षप्रदा हैं'—

त्यक्त्वा गृहं च यस्तीर्थे निवसेन्मरणोत्सुकः।
मुक्तिक्षेत्रेषु म्रियते स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका।
पुरी द्वारवती ज्ञेयाः सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥
(४९।११३-११४)


हे तार्क्ष्य! ज्ञान-वैराग्यसे युक्त यह सनातन मोक्ष-धर्म ऐसा ही है। इसको तुम्हें सुना भी दिया है। दूसरा प्राणी भी ज्ञान-वैराग्यपूर्वक इसको सुनकर मोक्ष प्राप्त करता है।

'तत्त्वज्ञ मोक्ष प्राप्त करते हैं, धर्मनिष्ठ स्वर्ग जाते हैं। पापी नरकमें जाते हैं। पक्षी आदि इसी संसारमें अन्य योनियोंमें प्रविष्ट होकर घूमते रहते हैं'—

मोक्षं गच्छन्ति तत्त्वज्ञा धार्मिकाः स्वर्गतिं नराः।
पापिनो दुर्गतिं यान्ति संसरन्ति खगादयः ॥
(४९।११६)

सूतजीने कहा—हे महर्षियो! अपने प्रश्नके उत्तरके रूपमें भगवान्‌के मुखसे इस प्रकार सिद्धान्तको सुनकर प्रसन्न शरीरवाले गरुडने जगदीश्वरको प्रणाम किया और कहा—प्रभो! आपके इन आह्लादकारी वचनोंसे मेरा बहुत बड़ा संदेह दूर हो गया। ऐसा कहकर उन्होंने भगवान् विष्णुसे जानेकी आज्ञा ली और वे कश्यपजीके आश्रममें चले गये।

हे ब्राह्मणो! जिस प्रकार प्राणी मृत्युके बाद तत्काल दूसरी योनिमें चला जाता है अथवा जैसे वह विलम्बसे देहान्तरको प्राप्त करता है, इन दोनों बातोंमें परस्पर कोई विरोध नहीं है। हे तात! जैसा मैंने भगवान्‌से सुना है, वैसा ही मैंने आपको सुना दिया है। लक्ष्मीपति भगवान् नारायणके इन वाक्योंको सुनकर मरीचिपुत्र कश्यप भी बहुत प्रसन्न हुए। ब्रह्मासे इस महापुराणको सुनकर मैंने आप लोगोंको भी वही सुनाया है। इससे आप सभीका संदेह भी दूर हो गया। गरुडके द्वारा कहा गया यह महापुराण बड़ा ही विचित्र है।

इस महापुराणको गरुडने हरिसे प्राप्त किया था। उसके बाद गरुडसे भृगुको प्राप्त हुआ। तदनन्तर भृगुसे वसिष्ठ, वसिष्ठसे वामदेव, वामदेवसे पराशरमुनि, पराशरमुनिसे व्यास और व्याससे मैंने इसे सुना है। हे ऋषियो! मेरे द्वारा अब आप सबको परम गोपनीय यह वैष्णव पुराण सुनाया गया है। जो

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