भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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६१० [संक्षिप्त गरुडपुराण] [ब्रह्म-

चरणकमलोंका मैं सदा चिन्तन करती हूँ। हे ईश! आपके चरणरजका मैं सदा स्मरण करती हूँ। हे कृपालु! हे भक्तवत्सल! आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार शची देवी स्तुतिकर चुप हो गयीं। इसके बाद रतिने स्तुति करना आरम्भ किया।

रतिने कहा— हे नर-रूप धारण करनेवाले हरे! आपने अपने सेवकोंपर अनुकम्पा करनेके लिये यह अवतार धारण किया है, मैं आपके उस मुखारविन्दका सदा चिन्तन करती हूँ। हे देव! जो कुञ्चित केशराशिसे सुशोभित है तथा ब्रह्मा, रुद्र, लक्ष्मी आदिद्वारा स्तुत्य है, मैं आपके उस श्रीनिकेतन मुखकमलका ध्यान करती हूँ, आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार अतिशय आदरके साथ रति स्तुति कर भगवान्‌के समीप ही स्थित हो गयीं। रतिके बाद दक्षने स्तुति आरम्भ की।

दक्षने कहा— भगवान्‌का चरणोदकरूप जो तीर्थ है, उसका मैं सदा चिन्तन करता हूँ। वह चरणजल ब्रह्माके द्वारा भलीभाँति सेवित है। ब्रह्मा आदि सभी देवोंके द्वारा वन्दनीय है। वही पवित्रतम चरणोदक गङ्गारूपी नदियोंमें श्रेष्ठ तीर्थ हुआ, जिस पवित्र पदरजमिश्रित गङ्गाको अपने जटाकलापमें धारण करनेसे अशिव भी शिव हो गये। हे करुणेश! हे विष्णो! ऐसे कृपावतार आपकी स्तुति करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। हे निदानमूर्ते! आप सभी प्रकारसे मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार स्तुति कर दक्ष चुप हो गये। इसके बाद बृहस्पतिने स्तुति करना आरम्भ किया।

बृहस्पतिने कहा— हे ईश! मैं आपके मुखकमलका सतत चिन्तन करता हूँ, आप मुझे सांसारिक विषयोंसे विरक्त करें। स्त्री, पुत्र, मित्र तथा पशु आदि ये सभी नाशवान् हैं, इनके प्रति मेरी जो आसक्ति है उसे आप नष्ट कर दें। हे देव! इस संसारचक्रमें भ्रमण करते हुए मैंने यह अनुभव किया है कि 'यह संसार दुःखसे परिव्याप्त है।' इसीसे मुक्ति पानेके लिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे देवाधिदेव! मेरी रक्षा करें।

इस प्रकार स्तुति कर बृहस्पति मौन हो गये। तदनन्तर अनिरुद्धने स्तुति करना आरम्भ किया।

अनिरुद्धने कहा— हे हरे! आपकी रसमयी कथाके आस्वादका परित्याग करके जो स्त्रियोंके विष्ठा आदिसे परिपूर्ण शरीर-रसके आनन्दमें निमग्न रहता है, वह मन्दबुद्धि सूकरके समान है। हे मुरारे! मज्जा, अस्थि, पित्त, कफ, रक्त तथा मलसे परिव्याप्त और चर्म आदिसे आवेष्टित स्त्री-मुखमें आसक्त व्यक्तिका पतन ही होता है। हे विभो! मुझ-जैसे पापमतिके लिये आपकी मायाका ही बल है। इस अत्यन्त मात्र दुःखरूप तथा लेशमात्र सुखसे भी रहित संसार-चक्रमें भ्रमण करता हुआ मैं मल-निःसारण करनेवाले नौ छिद्रोंसे युक्त इस शरीरमें आसक्त होता हुआ अत्यन्त मूढ़बुद्धि हूँ। हे देव! आपके सत्कथामृतको छोड़कर मैं घरमें रहते हुए परिवारके पालनमें अनुरक्त तथा दान आदि शुभ कर्मोंसे विरत हो गया हूँ। हे देव! आपको नमस्कार है। आप मेरे इस संसार-मलको दूर करें और दिव्य कथामृतके पानकी शक्ति दें। मैं आपके सद्गुणोंका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हूँ।

हे खगेश्वर! अनिरुद्ध इस प्रकार स्तुति करके चुप हो गये। इसके बाद स्वायम्भुव मनुने स्तुतिका उपक्रम किया—

स्वायम्भुव मनुने कहा— हे देव! आपकी स्तुति करनेके लिये प्रयत्नशीलमात्र होनेसे गर्भका दुःख नहीं होता है अर्थात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। हे प्रभो! आपकी इसी कृपासे मैंने परम पूज्यपदको प्राप्त किया है।

तदनन्तर स्तुति करते हुए वरुणने कहा— हे प्रभो! आपकी इच्छासे रचित देहरूपी घरमें, पुत्रमें, स्त्रीमें, धनमें, द्रव्यमें 'यह मेरा है' और 'मैं इसका हूँ' इस अल्पबुद्धिके कारण मूर्खजन संसाररूपी दुःखमें निमग्न हो जाते हैं, इसलिये मेरी ऐसी कुबुद्धिका विनाश कर आप अपने चरणोंकी दासता