भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] नारायणकी पूर्णताका वर्णन तथा पदार्थोंके सारासारका निर्णय ६१५

नारायणकी पूर्णताका वर्णन तथा पदार्थोंके सारासारका निर्णय

श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षिराज! जो मूलस्वरूप पूर्ण गुणसम्पन्न सर्वथा स्वतन्त्र, पुरातन पूर्ण शरीरवाले आनन्दस्वरूप भगवान् अनन्त हैं उनके समान कोई भी नहीं है। उनके चरण आदि सभी अङ्ग अपनेमें पूर्ण हैं। उनके एक-एक रोममें उतना ही बल है जितना उनका समग्र बल है। इस प्रकार वे सब प्रकारसे पूर्ण हैं। अतः वे ही सबके कर्ता हैं, वे ही सबके हर्ता हैं और वे ही इस सृष्टिके सार अंशके भोक्ता भी हैं।

हे पक्षीन्द्र! वे हरि सारहीन अथवा असार-अंशका भोग नहीं करते, समस्त द्रव्य पदार्थोंके सारभागको ही ग्रहण करते हैं। वे नित्य भक्तोंके प्रति दयालु और भक्तोंके हितचिन्तक हैं। भक्तोंद्वारा निवेदित भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थों तथा उपचारोंके सारभागको वे बड़े ही आदरके साथ ग्रहण करते हैं। समयद्वारा दूषित एवं भावदुष्ट पदार्थोंको नारायण ग्रहण नहीं करते; द्राक्षा आदि जो फल उन्हें समर्पित किये जाते हैं, वे भी काल आदिके प्रभावसे दोषयुक्त हो जाते हैं इसलिये हे पक्षिश्रेष्ठ! अब आप द्रव्योंके सारासारके विषयमें सुनें—

जामुन आदिके फल अतिशय पकनेके बाद चार दिनमें सारहीन हो जाते हैं। एक मासके बाद कटहल असार हो जाता है। छः मासके बाद खजूर तिक्त पदार्थके समान हो जाता है। पवित्र नारिकेल फोड़नेके बाद एक दिन-रातके अनन्तर असार हो जाता है। सूखे नारिकेल और खजूरमें यह दोष नहीं आता।

हे पक्षिराज! एक वर्षके बाद सुपाड़ी, एक घड़ी (२४ मिनट)-के बाद ताम्बूल, तीन घंटेके बाद पके हुए अन्न और सूप आदि असार हो जाते हैं। तीन पक्षके बाद तेलमें पकाया पदार्थ और बारह घंटेके बाद घीमें पकाया हुआ पदार्थ असार हो जाता है। नौ घंटेके बाद शाक निःसार हो जाता है। जम्बीरी नीबू, शृंगवेर, आँवला, कपूर तथा आम एक वर्षके बाद निःसार हो जाते हैं। परंतु हे द्विज! तुलसी सदा सारयुत ही रहती है, एकादशीके दिन गीली हो या सूखी हो अथवा जलके साथ हो वह सदा सारवान् ही बनी रहती है—

तुलसी सर्वदा सारा एकादश्यामपि द्विज।
आर्द्रा वाप्यथवा शुष्का सार्द्रा सारवती स्मृता॥
(१४।२९)

सारयुता तुलसीको ग्रहण करना चाहिये। एकादशीके दिन अन्न निःसार हो जाता है। हे खगेश्वर! एकादशीके दिन मनुष्योंके लिये हरिका तीर्थ (चरणामृत) सार होता है। हे गरुड! आषाढ़ मासमें शाक, भाद्रपद मासमें दही, आश्विन मासमें दूध निःस्सार हो जाता है, इसी प्रकार हरिके नामोच्चारसे विहीन मुख और हरिको नैवेद्यके रूपमें अर्पित किये बिना बना हुआ समस्त भोजन निःसार हो जाता है—

हरिनाम विहीनं तु मुखं निःसारमुच्यते।
हरिनैवेद्यहीनस्तु पाको निःसार उच्यते॥
(१४।३७)

तीन दिनमें अलसीका पुष्प, एक प्रहरमें मल्लिका, आधे पहरके बाद चमेली सारहीन हो जाती है। तीन वर्षतक केसर, दस वर्षतक कस्तूरी तथा एक वर्षतक कपूर सारवान् कहा गया है, परंतु चन्दनको सदा सारवान् ही कहा गया है—

ससारमितिसम्प्रोक्तं चन्दनं सर्वदा स्मृतम्॥
(१४।४१)

(अध्याय १४)

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