भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६२०संक्षिप्त गरुडपुराण[ ब्रह्म-

हे पक्षिराज ! पुत्रीके ऐसे निर्मल वचनोंको सुनकर श्रद्धासमन्वित हो पिता नलने भगवान् विष्णुको नमस्कार किया और यथाशक्ति उनकी प्रदक्षिणा की। तदनन्तर पुनः वह भद्रा भगवान्‌को प्राप्त करनेकी इच्छासे उन्हींके ध्यानमें निमग्न हो गयी, इसीमें उसका नश्वर शरीर भी कब शान्त हो गया, इसका उसे भान ही नहीं रहा।

श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिश्रेष्ठ ! पुनः मेरे पिता वसुदेवकी बहिनके उदरसे कैकेयी इस नामसे उस भद्रा नामवाली कन्याने जन्म लिया। भद्र गुणोंसे युक्त होनेके कारण वह उस जन्ममें भी भद्रा नामसे ही प्रसिद्ध हुई और उसे मैंने प्राप्त किया।

श्रीकृष्णने गरुडसे पुनः कहा— हे गरुड ! जिस प्रकार मित्रविन्दाका विवाह हुआ, अब मैं उसे बताता हूँ। मित्रविन्दा हरिकी सदैव प्रिय रही है। पूर्वजन्ममें हरिको मित्ररूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाली वह देवी सदा उनके विषयमें चिन्तन करती रहती थी कि किस उपायसे भगवान् विष्णुको प्राप्त किया जा सकता है। यद्यपि उन्हें प्राप्त करनेके बहुत-से उपाय हैं, पर श्रेष्ठतम उपाय कौन हो सकता है वह ऐसा विचार करने लगी। उसने निश्चय किया कि सभी साधनोंमें श्रेष्ठ साधन है 'सात्त्विक पुराणोंमें वर्णित भगवान्‌की कथाओंका श्रवण करना'। जो व्यक्ति भगवान् विष्णुकी कथाका श्रवण नहीं करता उसका जन्म लेना व्यर्थ है। जिसने भगवान् विष्णुके गुणानुवादका कीर्तन करनेवाले भागवतपुराणको नहीं सुना, उसका जीवन व्यर्थ है, इसलिये सदा हरिकथाका श्रवण करना चाहिये।

हे तात ! जहाँ भगवान् विष्णुसे सम्बन्धित कथारूपी महानदी प्रवाहित नहीं होती तथा जहाँ नारायणके चरणाम्बुजोंका आश्रय नहीं है और जहाँ मुखसे भगवान् विष्णुका नामस्मरण नहीं होता, वहाँ किसी प्रकारसे क्षणमात्र भी नहीं रहना चाहिये। 'जिस गाँवमें भागवतशास्त्रकी चर्चा नहीं होती और न जहाँ भागवतके रसको जाननेवाले ही होते हैं, साथ ही जिस घरमें भगवान् विष्णुके द्वारा कही गयी गीताके अर्थोंका निष्कर्ष जाननेवाले नहीं हैं अथवा जिस ग्राममें भगवान्‌की सहस्रनामावली (विष्णुसहस्रनाम)-की चर्चा नहीं होती अथवा जहाँ उन दोनों (गीता और विष्णुसहस्रनाम)-के रसोंका ज्ञान रखनेवाले नहीं हैं' वहाँ क्षणमात्र भी किसी प्रकारसे नहीं रहना चाहिये अथवा मनुष्यके जीवनमें जिस दिन भगवान् विष्णुकी दिव्य कथाका श्रवण नहीं होता है, उस दिन उस प्राणीकी आयु व्यर्थ हो जाती है—

यस्मिन् ग्रामे भागवतं न शास्त्रं न वर्तते भागवता रसज्ञाः ।
यस्मिन् गृहे नास्ति गीतार्थसारो यस्मिन् ग्रामे नामसहस्रकं वा ॥
तयो रसज्ञा यत्र न सन्ति तत्र न संवसेत् क्षणमात्रं कथंचित् ।
यस्मिन् दिने दिव्यकथा च विष्णोर्न वास्ति जन्तोस्तस्य चायुर्वृथैव ॥
(२०। २९-३०)

रसपारखी विद्वान् स्वर्णादिसे निर्मित आभूषणोंसे विभूषित कानोंको सुन्दर नहीं कहते, भगवान् विष्णुकी मङ्गलमयी कथाओंसे पूरित कानोंको ही सुन्दर बताते हैं। इस कारणसे जो लोग सर्वदा भागवतके अर्थतत्त्वका श्रवण करते हैं और निरन्तर उसका वाचन करते हैं, उन्हींका जन्म सफल है, ऐसा श्रेष्ठ जनोंका कहना है। संसारमें हरि सर्वत्र व्याप्त हैं, वे ही नित्य हैं, अन्तर्यामी हैं ऐसा समझते हुए जिनके द्वारा सदा भलीभाँति प्रभुका चिन्तन किया जाता है, उनके योगक्षेमका वहन वे विष्णु स्वयं ही करते हैं ऐसे भक्तोंका [कभी] अशुभ नहीं होता है।

भगवान् हरि शुभ-अशुभ फल कर्मानुसार ही देते हैं, इसलिये धनप्राप्तिके लिये कोई यत्न नहीं करना चाहिये। प्रयत्न तो हरितत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही करना उचित है।

इसी कारण हे तात ! मैं भी सदैव भगवान्‌की सत्कथाओंका श्रवण किया करती हूँ। पूर्वकालमें मैंने भगवान्‌की कथाका श्रवण किया था और फिर