भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ]सुदर्शनचक्र-पूजा-विधि५७

नमो नारायणायैव नराणां पतये नमः ॥
नरपूज्याय कीर्त्याय स्तुत्याय वरदाय च ।
अनादिनिधनायैव पुराणाय नमो नमः ॥
सृष्टिसंहारकर्त्रे च ब्रह्मणः पतये नमः ।
नमो वै वेदवेद्याय शङ्खचक्रधराय च ॥
कलिकल्मषहर्त्रे च सुरेशाय नमो नमः ।
संसारवृक्षच्छेत्रे च मायाभेत्रे नमो नमः ॥
बहुरूपाय तीर्थाय त्रिगुणायागुणाय च।
ब्रह्मविष्ण्वीशरूपाय मोक्षदाय नमो नमः ॥
मोक्षद्वाराय धर्माय निर्वाणाय नमो नमः ।
सर्वकामप्रदायैव परब्रह्मस्वरूपिणे ॥
संसारसागरे घोरे निमग्नं मां समुद्धर ।
त्वदन्यो नास्ति देवेश नास्ति त्राता जगत्प्रभो ॥
त्वामेव सर्वगं विष्णुं गतोऽहं शरणं ततः ।
ज्ञानदीपप्रदानेन तमोमुक्तं प्रकाशय ॥
(३२।३०—३८)

'हे वासुदेव! हे संकर्षण (बलराम)! आपको नमस्कार है। हे प्रद्युम्न, आदिदेव, अनिरुद्ध! आपके लिये नमस्कार है। हे नारायण! नराधिपति! आपको नमन है, कीर्तन करने योग्य, मनुष्योंसे पूजनीय, स्तुति करने योग्य, वर देनेवाले, आदि तथा अन्तसे रहित सनातन प्रभुको बारम्बार नमस्कार है। सृष्टि और संहार-कर्ता, ब्रह्माके भी स्वामी तथा शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। नमस्कार है।'

कलिकालके दोषोंको नष्ट करनेवाले, देवोंके ईश! आपको बारम्बार प्रणाम है। सम्पूर्ण जगत्-रूपी मूल वृक्षका छेदन करनेवाले, मायाका भेदन करनेवाले, बहुतसे रूपोंको धारण करनेवाले, तीर्थस्वरूप, सत्त्व, रजस् तथा तमोरूप एवं वस्तुतः निर्गुण तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन रूपोंमें अवस्थित रहनेवाले मोक्षदायक भगवान् विष्णु परमेश्वरको नमस्कार है। मोक्षके द्वारभूत, धर्मस्वरूप, निर्वाणरूप, समस्त अभीष्टोंको प्रदान करनेवाले परब्रह्मस्वरूप आपके लिये बार-बार नमस्कार है। इस गहन संसारसागरमें मैं डूब रहा हूँ, आप मेरा उद्धार करें। हे देवदेवेश्वर ! हे जगत्के स्वामी! आपके अतिरिक्त मेरा कोई भी रक्षक नहीं है। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हे भगवान् विष्णु! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे भगवन् ! ज्ञानरूपी दीपकको प्रज्वलितकर मेरे (अज्ञानरूपी) अन्धकारको दूर करके मुझे प्रकाशित कर दें।

इस प्रकार समस्त कष्टोंको दूर करनेवाले देवेश भगवान् वासुदेवकी स्तुति करके हे नीललोहित शिव! अन्य वैदिक स्तोत्र-पाठोंसे भी स्तुति करके पञ्चतत्त्वोंसे युक्त उन भगवान् विष्णुका अपने हृदयमें ध्यान करे। इसके बाद विसर्जन करना चाहिये। इस प्रकार हे शङ्कर! सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली वासुदेवकी श्रेष्ठ पूजा कही गयी। इस पूजाके करनेमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

हे रुद्र! जो व्यक्ति इस पञ्चतत्त्वार्चनको पढ़ता है, सुनता है अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ३२)


सुदर्शनचक्र-पूजा-विधि

रुद्रने कहा— हे शङ्ख-गदाधर! उस सुदर्शनकी पूजाके विषयमें मुझे बतायें, जिसे करनेसे ग्रहदोष और रोगादि—सभी कष्ट विनष्ट हो जाते हैं।

श्रीहरिने कहा— हे वृषभध्वज! सुदर्शनचक्रकी पूजा-विधिको मैं कह रहा हूँ, आप सुनें। सर्वप्रथम स्नान करके हरिका पूजन करे। साधकको चाहिये कि अपने निर्मल एवं शुभ हृदय-कमलमें भगवान्