गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] भगवान् हयग्रीवके पूजनकी विधि ५१
हे शङ्कर ! उस पूजनका मूल मन्त्र हयग्रीवदेवका ही वाचक है। वह परम पुण्यशाली मन्त्र इस प्रकार है—
‘ॐ सौं क्षौं शिरसे नमः’ यह प्रणव-युक्त मन्त्र सभी प्रकारकी विद्याओंको प्रदान करनेवाला है।
‘ॐ क्षां हृदयाय नमः, ॐ क्षीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्षूं शिखायै वषट्, ॐ क्षैं कवचाय हुम्, ॐ क्षौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ हः अस्त्राय फट्—इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास और करन्यास करना चाहिये।
हे शङ्कर ! वे हयग्रीव देव शङ्ख, कुन्दपुष्प, चन्द्रके सदृश श्वेतवर्ण, कमलनालतन्तु और रजतधातुकी कान्तिके समान देहकान्तिको धारण करनेवाले, गौके दुग्धकी भाँति और करोड़ों सूर्योंके सदृश प्रतिभासित होनेवाले, शङ्ख, चक्र, गदा तथा पद्मको धारण किये हुए चार भुजावाले हैं। वे सर्वव्यापी देवता मुकुट, कुण्डल, वनमालासे सुशोभित, सुदर्शनचक्रसे युक्त, सुन्दर-सुन्दर कपोलोंवाले, पीताम्बरको धारण किये हुए हैं। सभी देवोंसे युक्त उन विराट्देवकी अपनेमें भावना करके अङ्गमन्त्रोंसे तथा मूल मन्त्रसे न्यास करना चाहिये। इसके पश्चात् मूल मन्त्रसे ही शङ्ख, पद्मादिकी मङ्गलमयी मुद्राएँ प्रदर्शित करनी चाहिये। हे शङ्कर ! इस प्रकार मुद्राएँ दिखा करके मूल मन्त्रसे विष्णुका ध्यान करके अर्चा करनी चाहिये।
हे रुद्र ! इसके बाद हयग्रीवके आसनके संनिकट अवस्थित रहनेवाले जो अन्य देव हैं, उनका आवाहन करना चाहिये। यथा—
‘ॐ हयग्रीवासनस्य आगच्छत च देवताः।’
—इस प्रकार आवाहन करके स्वस्तिक या सर्वतोभद्रमण्डलके अन्तर्गत उन देवोंका पूजन करके द्वारपर धाता और विधाताकी पूजा सम्पन्न करनी चाहिये।
हे वृषध्वज ! ‘समस्तपरिवाराय अच्युताय नमः’—इस मन्त्रसे मण्डलके मध्यमें भगवान् विष्णुका पूजन करके द्वारपर गङ्गा, महादेवी तथा शङ्ख एवं पद्म नामक निधिकी पूजा करके अग्रभागमें गरुड तथा मध्यभागमें आधार नामवाली शक्तिकी पूजा करनी चाहिये।
हे महादेव ! तदनन्तर कूर्म, अनन्त एवं पृथ्विका पूजन करे और अग्निकोणमें धर्म, नैर्ऋत्यकोणमें ज्ञान, वायुकोणमें वैराग्य तथा ईशानकोणमें ऐश्वर्यका पूजन करना चाहिये। इसके बाद पूर्व दिशामें अधर्म, दक्षिण दिशामें अज्ञान, पश्चिम दिशामें अवैराग्य तथा उत्तर दिशामें अनैश्वर्यका भी पूजन करना चाहिये। इसके बाद मण्डलके मध्यमें सत्त्व, रजस् तथा तमस्—इन तीन गुणोंकी पूजा करके मध्यभागमें ही कन्द, नाल और पद्मकी विधिवत् पूजा करे। तदनन्तर मध्यदेशमें अर्क, सोम और अग्निमण्डलका पूजन करना चाहिये।
हे वृषध्वज ! विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्नी, सत्या, ईशाना तथा अनुग्रहा नामक ये शक्तियाँ हैं। पूर्वादि दिशाओंमें—पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तरमें अवस्थित पद्मपत्रोंपर यथाक्रम, ‘ॐ विमलायै नमः’, ‘ॐ उत्कर्षिण्यै नमः’, ‘ॐ ज्ञानायै नमः’, ‘ॐ क्रियायै नमः’, ‘ॐ योगायै नमः’ इत्यादि मन्त्रोंसे विमलादि शक्तियोंका पूजन करना चाहिये। कल्याणकामी व्यक्तिको चाहिये कि वे अनुग्रहा नामक शक्तिकी पूजा पद्मकी कर्णिकामें ‘ॐ अनुग्रहायै नमः’ इस मन्त्रसे करें।
इस विधिसे स्नान, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य समर्पण करके देवके आसनका मङ्गलमय पूजन करना चाहिये। इस पूजाके पश्चात् देवाधिदेव भगवान् हयग्रीवदेवका मण्डलमें आवाहन करना चाहिये। आवाहन करके समाहित होकर उनका न्यास भी करना चाहिये। न्यास करनेके पश्चात्