गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] विष्णुके पवित्रारोपणकी विधि ६७
विष्णुके पवित्रारोपणकी विधि
श्रीहरिने कहा— हे वृषभध्वज ! अब मैं आपसे विष्णुके पवित्रारोपणका वर्णन करूँगा, जो भोग तथा मोक्ष दोनोंको देनेवाला है। प्राचीन समयमें हो रहे देवासुर-संग्राममें [अपनी विजय न होते देखकर] ब्रह्मादि देवगण विष्णुकी शरणमें गये। उन सबकी प्रार्थना सुन करके विष्णुने विजय-प्राप्तिके लिये उन्हें अपने गलेका हार, पवित्र नामक ग्रैवेयक तथा एक ध्वज प्रदान किया और कहा कि इन्हें देखते ही दानव नष्ट हो जायँगे। तभीसे उन पवित्रकोंकी पूजा आरम्भ हुई।
हे हर! प्रतिपदासे लेकर पौर्णमासीतक जिस देवताकी जो तिथि कही गयी है, उसके अनुसार ही उस तिथिमें उन देवताओंका पवित्रारोपण करना चाहिये। हे शिव! शुक्ल-पक्ष हो अथवा कृष्णपक्ष, द्वादशी तिथिमें विष्णुके लिये पवित्रारोपणका विधान है। व्यतीपातयोग, उत्तरायण, दक्षिणायन, चन्द्र तथा सूर्यग्रहण, विवाहादि मङ्गल एवं वृद्धि-कार्यों तथा गुरुजनके आगमन इत्यादि अवसरोंपर यह पूजा करनी चाहिये। पवित्रकके उद्देश्यसे भी नित्य पूजन हो सकता है; किंतु वर्षाकालमें इसका पूजन आवश्यक है।
हे रुद्र! इन पवित्रकोंका निर्माण वर्णानुसार होना चाहिये, जैसे—ब्राह्मणोंका पवित्रक कौशेय<sup>१</sup>, कपास, क्षौम<sup>२</sup> अथवा कुशसूत्रसे निर्मित होना चाहिये। क्षत्रियोंका पवित्रक कौशेयसूत्रसे, वैश्योंका क्षौमसूत्र तथा वल्कलसूत्रसे<sup>३</sup> और शूद्रोंका सनसे बना हुआ पवित्रक प्रशस्त माना गया है। कपास या पद्मज (कमल)-से निर्मित पवित्रक समस्त वर्णोंके लिये प्रशस्त है।
ॐकार, शिव, चन्द्रमा, अग्नि, ब्रह्मा, शेष, सूर्य, गणेश और विष्णु—इन नौ देवताओंका इस पवित्रकके तन्तुओंमें निवास है।
ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—ये पवित्रकके तीन सूत्रोंके देवता हैं, जो उनमें अधिष्ठित रहते हैं। इन सूत्रोंको सुवर्ण, रजत, ताम्र, बाँस या मिट्टीके बने हुए पात्रमें रखना चाहिये। एक सौ आठ तन्तुओंका सूत्र उत्तम, चौवन तन्तुओंका सूत्र मध्यम तथा सत्ताईस तन्तुओंका पवित्रक कनिष्ठ होता है।
इन पवित्रकोंके प्रत्येक ग्रन्थि-पर्वोंको कुंकुम, हल्दी या चन्दनसे चर्चितकर उपवास रखते हुए उन्हें शास्त्रसम्मत पात्रमें रखकर अधिवासित करे।
पवित्रकको पृथक्-पृथक् अभिमन्त्रित करके उसका सम्यक् दर्शन तथा पुनः पूजन करना चाहिये और यत्नपूर्वक उसका वस्त्राच्छादन करके उसे मण्डलस्थ देवप्रतिमाके समक्ष यत्नपूर्वक स्थापित कर देना चाहिये।
ब्रह्मादि अन्य देवोंकी स्थापना करके कलशकी पूजा करे। मण्डलका निर्माण करके नैवेद्य समर्पित करे। पवित्रकको पुनः अधिवासित<sup>४</sup> करके तीन या नौ बार सूत्र घुमाकर वेदीको वेष्टित करे। तदनन्तर अपनेको तथा कलश, घी, अग्निकुण्ड, विमान, मण्डप और गृहको सूत्रसे वेष्टित करके एक सूत्र देवताके मस्तकपर अर्पित करे।
इस प्रकार सम्पूर्ण सामग्री निवेदितकर महेश्वर विष्णुकी पूजा करके इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये—
१-कौशेय—विशेष कीड़ेके कोशसे बननेवाला वस्त्र (रेशमी वस्त्र)।
२-क्षौम—तीसी, केलेकी छाल या अन्य लताविशेषसे बने वस्त्र।
३-वल्कल—भोजपत्र नामके वृक्षविशेष अथवा अन्य मुलायम छालवाले वृक्षकी छालसे बना वस्त्र (वल्कल वस्त्र)।
४-अधिवासन—संस्कारविशेष।