गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि [ ८१
पश्चिम आदि दिशाओंमें आसीन ऋत्विजोंसे करवाना चाहिये। इस हवन-कर्ममें एक-एक सहस्र आहुतिका विधान है और इन आहुतियोंमें वेदोंके आदि मन्त्रों, देवताके नाम-मन्त्रों, अपनी शाखाके विहित मन्त्रों, गायत्री-मन्त्रके साथ यथाविधान व्याहृति एवं प्रणवका प्रयोग करना चाहिये। साथ ही यह भावना करनी चाहिये कि हम इन आहुतियोंको देवताके शिरोभाग, मध्यभाग तथा पादभाग आदिमें समर्पित कर रहे हैं और स्वयंको देवमय समझना चाहिये।
इस प्रकार होम-विधिको सम्पन्न करके देशिक (आचार्य)-को चाहिये कि वह देव-विग्रहमें मन्त्रोंका न्यास करे। यथा— ‘ॐ अग्निमीळे०’ मन्त्रका देवके दोनों चरणोंमें, ‘ॐ इषेत्वेति०’ मन्त्रका दोनों गुल्फोंमें, ‘ॐ अग्न आयाहि०’ मन्त्रसे देवकी दोनों जंघाओंमें, ‘ॐ शं नो देवी०’ मन्त्रका दोनों जानुओंमें, ‘ॐ बृहद्रथन्तर०’ मन्त्रका दोनों ऊरुओंमें न्यास विहित है। देवके उदर भागमें भी इसी प्रकार न्यास करना चाहिये। तदनन्तर ‘ॐ दीर्घायुष्ट्वाय०’ मन्त्रका देवके हृदयमें, ‘ॐ श्रीश्चते०’ मन्त्रका गलेमें, ‘ॐ त्रातारमिन्द्र०’ मन्त्रका वक्षःस्थलमें, ‘ॐ त्र्यम्बक०’ मन्त्रका दोनों नेत्रोंमें तथा ‘ॐ मूर्द्धा भव०’ मन्त्रका मस्तकमें न्यास करके विहित लग्नमुहूर्तमें हवन करे।
इसके पश्चात् ‘ॐ उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते०’ मन्त्रसे देवमूर्तिका उत्थापन करके मन्त्रवेत्ता आचार्य ‘देवस्य त्वा०’ मन्त्रसे मूर्तिका स्पर्श करते हुए वेदोक्त पुण्याहवाचनके साथ देवप्रासादकी प्रदक्षिणा करे। इसके अनन्तर विविध रत्न, विविध धातु, लौहद्रव्य एवं विधानके अनुसार अनेक प्रकारके सिद्धबीजोंके साथ दिक्पाल आदि देवताओंकी प्रदक्षिणा विहित है। इसके अनन्तर यथास्थान प्रधान देवप्रतिमाकी प्रतिष्ठा होनी चाहिये।
देवमूर्तिको मन्दिरके मुख्य गर्भभागमें स्थापित नहीं करना चाहिये और न उस गर्भका परित्याग करके अन्यत्र ही उसकी स्थापना होनी चाहिये, अपितु गर्भभागका कुछ मध्यभाग छोड़कर उसे स्थापित करनेसे दोषका परिहार हो जाता है। अतः तिलके कणमात्र परिमाणमें मूर्तिको उत्तरकी ओर कुछ बढ़ा लेना चाहिये।
‘ॐ स्थिरो भव’, ‘शिवो भव’, ‘प्रजाभ्यश्च नमो नमः’, ‘देवस्य त्वा सवितुः०’ आदि मन्त्रोंसे गुरु देवमूर्तिका यथाविधि विन्यास एवं अभिमन्त्रण करे। साथ ही सुप्रतिष्ठित देवप्रतिमाको यथाविधान सम्पातकलशके जलसे ही स्नान कराना चाहिये।
तदनन्तर धूप-दीप, अन्य सुगन्धित पदार्थ तथा नैवेद्यसे उस देवप्रतिमाकी विधिवत् पूजा करके अर्घ्य प्रदान करे और प्रणाम निवेदन करके क्षमा-प्रार्थना करे।
उसके बाद अपनी शक्तिके अनुसार यजमान ऋत्विजोंको पात्र, वस्त्र एवं उपवस्त्र, छत्र, सुन्दर बहुमूल्य अँगूठी तथा दक्षिणा देकर संतुष्ट करे। तदनन्तर सावधान होकर यजमान चतुर्थी होम करे। सौ आहुतियोंको देकर अन्तमें वह पूर्णाहुति प्रदान करे।
इसके बाद आचार्य मण्डपसे बाहर आकर दिक्पालोंको बलि प्रदान करके पुष्प लेकर ‘क्षमस्व’ इस वाक्यसे उन देवोंका विसर्जन कर दे।
इस प्रकार यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात् आचार्यको कपिला धेनु, चामर, मुकुट, कुण्डल, छत्र, केयूर, कटिसूत्र, व्यजन (पंखा), वस्त्रादि वस्तुएँ, ग्राम तथा साज-सज्जापूर्ण सुन्दर भवन प्रदान करना चाहिये। तदनन्तर आचार्य तथा अन्य सहयोगीजनोंके लिये सुन्दर विशाल भोजका आयोजन कराकर सबको संतुष्ट करना चाहिये। ऐसा करनेसे यजमान कृतार्थ हो जाता है और वास्तुदेवकी प्रसन्नतासे उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। (अध्याय ४८)