गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] वर्ण एवं आश्रमधर्मोंका निरूपण ८३
अन्तिम भावना कहते हैं, जो पारमेश्वरी भावनाके नामसे भी जानी जाती है<sup>१</sup>।
मनुष्यको धर्मसे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है, अर्थसे काम-पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। वेदमें प्रवृत्ति और निवृत्तिके भेदसे दो प्रकारके कर्म कहे गये हैं। वेदशास्त्रानुसार अग्नि आदि देव एवं गुरु-विप्रादिको प्रसन्न करनेके लिये जो कर्म विहित हैं, वे प्रवृत्तिकर्म हैं तथा सविधि कर्मानुष्ठानसे चित्तशुद्धिके अनन्तर आत्मज्ञानमात्रमें सदा रत रहना निवृत्तिकर्म है।
क्षमा, दम, दया, दान, निर्लोभता, स्वाध्याय, सरलता, अनसूया, तीर्थको<sup>२</sup> अनुसरण, सत्य, संतोष, आस्तिक्य, इन्द्रियनिग्रह, देवार्चन—विशेषकर ब्राह्मणोंका पूजन, अहिंसा, प्रियवादिता, अरूक्षता और अपैशुन्य (चुगली न करना)—इन सभीको चारों आश्रमोंका सामान्य धर्म स्वीकार किया गया है<sup>३</sup>।
इसके बाद अब मैं चारों वर्णोंको प्राप्त होनेवाले स्थानके विषयमें कह रहा हूँ।
उपर्युक्त वेद-विहित कर्मोंको करनेवाले ब्राह्मणोंके निमित्त प्राजापत्य नामका स्थान है (अर्थात् ब्राह्मण ऐसे धर्मोंका पालन करता हुआ अन्त समयमें प्राजापत्य लोक प्राप्त करता है)। युद्धमें न भागनेवाले धर्मरत क्षत्रियोंको स्वर्गमें इन्द्रका स्थान प्राप्त होता है। सदैव अपने धर्ममें अनुरक्त रहनेवाले वैश्य अन्तमें मरुद् देवके स्थानको प्राप्त करते हैं। ब्राह्मणादि द्विजोंकी सेवामें तत्पर रहनेसे शूद्रोंको गन्धर्वलोक प्राप्त होता है।
ऊर्ध्वरेतस् ब्रह्मनिष्ठ अट्ठासी सहस्र ऋषियोंने तपस्याके द्वारा जिस स्थानको प्राप्त किया था, वही स्थान गुरुकुलमें निवास करनेवाले ब्रह्मचारीको प्राप्त होता है। जो स्थान मरीचि, अत्रि आदि सप्तर्षियोंको प्राप्त है, वह स्थान वानप्रस्थाश्रमी प्राप्त करते हैं। संयमित चित्तवाले, ऊर्ध्वरेतस् संन्यासियोंको वह आनन्दरूप परब्रह्मपद प्राप्त होता है, जहाँसे पुनः आगमनकी सम्भावना नहीं होती। यह परब्रह्मपद व्योम नामके अक्षरतत्त्वके रूपमें, योगियोंके अमृतस्थानके रूपमें एवं ईश्वरसम्बन्धी परम आनन्दके रूपमें प्रसिद्ध है। इस स्थानको प्राप्त करनेवाला मुक्त आत्मा पुनः संसारमें नहीं आता है। अभी जिस मुक्तात्माकी चर्चा की गयी है, उसको प्राप्त होनेवाली मुक्ति अष्टाङ्ग-मार्गका सम्यक्-ज्ञान रखनेसे प्राप्त होती है। अतः मैं संक्षेपमें उसे भी कह रहा हूँ। आप सुनें।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह—ये पाँच यम हैं। प्राणीकी हिंसा न करना अहिंसा है। प्राणियोंके हितमें बोलना सत्य है। दूसरेकी वस्तु अपहरण न करना अस्तेय है। अमैथुनका पालन करना ब्रह्मचर्य है और सब कुछ त्याग देना अपरिग्रह है।
शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा प्रणिधान—ये पाँच नियम हैं। बाह्य और आभ्यन्तर रूपसे शौचके दो भेद हैं। इसी प्रकार संतोषको तुष्टि, इन्द्रिय-निग्रहको तप, मन्त्र-जपको स्वाध्याय और भगवत्पूजनादिको प्रणिधान कहते हैं<sup>४</sup>।
१-ब्रह्मभावनाके ये तीन भेद ब्रह्मानुसंधानकी प्राथमिक, माध्यमिक और अन्तिम स्थितिको दृष्टिमें रखकर किये गये हैं।
२-'तीर्थ' शब्द श्रेष्ठताका वाचक है।
३- क्षमा दमो दया दानमलोभा (भो) भ्यास एव च॥
आर्जवं चानसूया च तीर्थानुसरणं तथा। सत्यं संतोष आस्तिक्यं तथा चेन्द्रियनिग्रहः॥
देवताभ्यर्चनं पूजा ब्राह्मणानां विशेषतः। अहिंसा प्रियवादित्वमपैशुन्यमरूक्षता॥
एते आश्रमिका धर्माश्चातुर्वण्यं ब्रवीम्यतः। (४९। २१–२४)
४-यमाः पञ्च त्वहिंसाद्या अहिंसा प्राण्यहिंसनम्॥
सत्यं भूतहितं वाक्यमस्तेयं स्वाग्रहं परम्। अमैथुनं ब्रह्मचर्यं सर्वत्यागोऽपरिग्रहः॥
नियमाः पञ्च सत्याद्या बाह्यामाभ्यन्तरं द्विधा। शौचं तुष्टिश्च संतोषस्तपश्चेन्द्रियनिग्रहः॥
स्वाध्यायः स्यान्मन्त्रजापः प्रणिधानं हरेर्यजिः। (४९। ३०–३३)