भारतकोश
गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

गौतम धर्मसूत्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Gautama Dharmasutra Hindi

महर्षि गौतम द्वारा

स्रोत: Gautama Dharmasutram with Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished360 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 360 में से

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पृष्ठ 225

१६० गौतमधर्मसूत्राणि

अथवा अपनी सामर्थ्य के अनुसार ( नौ से कम अयुग्म संख्या में ) ब्राह्मणों को भोजन दें ॥ ८ ॥

कीदृशान्भोजयेत्तत्राऽऽह—

श्रोत्रियान्वाग्रूपवयःशीलसंपन्नान् ॥ ९ ॥

श्रोत्रियानधीतवेदान् । वाक्संपत्तिः सुशिक्षितं वाक्यं संस्कृतभाषणादि । रूपसंपन्नान्सौम्यवेषानन्यूनाधिकाङ्गाञ्श्वित्राद्यदूषितान्वयःसंपन्नाननतिबालान् । शीलमन्तःकरणशुद्धिस्तत्संपन्नान् । एवंगुणान्भोजयेत् ॥ ९ ॥

वेदज्ञ, सुशिक्षित ( शुद्ध ) वाणी वाले, रूपसम्पन्न, वयस्क ( बालक न हों ), एवं शीलवान् ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ ९ ॥

युवभ्यो दानं प्रथमम् ॥ १० ॥

एवंगुणेभ्यो युवभ्यः श्राद्धदानं मुख्यः कल्पः ॥ १० ॥

उपरोक्त गुणों से युक्त युवक ब्राह्मणों को श्राद्धदान देना प्रमुख बताया गया है ॥ १० ॥

एके पितृवत् ॥ ११ ॥

एके मन्यन्ते पितृवत्पित्राद्यनुरूपं दानमिति । यथा पित्रे तरुणाः पितामहाय वृद्धाः प्रपितामहाय वृद्धतरा इति ॥ ११ ॥

कुछ आचार्यों का मत है कि पिता आदि के अनुरूप दान देना चाहिये । ( अर्थात् पिता के लिए तरुणों को, पितामह के लिए वृद्धों को और प्रपितामह के लिए अत्यन्त वृद्ध ब्राह्मणों को दान दे ) ॥ ११ ॥

न च तेन मित्रकर्म कुर्यात् ॥ १२ ॥

न च तेन श्राद्धेन मित्रकर्म कुर्यात् । येन मैत्री कार्या तस्मिन्नर्थापेक्षितं न भोजयेत् । मित्रलोभकारार्थं न भोजयेदित्यर्थः । आपस्तम्बस्तु—अनर्थापेक्षो भोजयेदिति विशेषेणाऽऽह ॥ १२ ॥

उस श्राद्धदान द्वारा किसी से मित्रता स्थापित करने का ( स्वार्थपूर्ण ) प्रयोजन नहीं सिद्ध करना चाहिए ॥ १२ ॥

पुत्राभावे सपिण्डा मातृसपिण्डाः शिष्याश्च दद्युः ॥१३॥

पुत्रा दद्युरिति प्रथमः कल्पः । तदभावे सपिण्डा भ्रातृतत्पुत्रादयः । तदभावे मातृसपिण्डा मातृभ्रातृतत्पुत्रादयः । तदभावे शिष्यः ॥ १३ ॥

पुत्रों के न होने पर सपिण्ड अर्थात् भाई या उनके पुत्र श्राद्ध करें, उनके भी

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